मैंने इन्ही आंखों से मौसम को बदलते देखा है
ग्रीष्म की वो तपती धूप देखी है
आलस्य से लिप्त जाड़े की दोपहर को देखा है
बरसात की भीगी मनमोहक मिटटी देखी है
मैंने इन्ही आंखों से मौसम को बदलते देखा है
तपते शब्दों में मुरझाये हुए जोश को देखा है
छिपाई हुई सूखी मुस्कान देखी है
मरासिम के गहन पेंचों को देखा है
मैंने इन्ही आंखों से मौसम को बदलते देखा है
बेरस जिंदगी में रसभरा बदलाव देखा है
नरम शब्दों में सोज़ का इज़हार देखा है
छीटों से रंगों का निखार देखा है
मैंने इन्ही आंखों से मौसम को बदलते देखा है....
Subscribe to:
Post Comments (Atom)
इतना आसान नहीं होता
इतना आसान नहीं होता हवाओं से हल्के मन को खुली फ़िज़ाओं में उड़ने देना! कई गिरह खोलने पड़ते हैं कई कड़ियाँ तोड़नी पड़ती हैं और देखिए विडम्बना...
-
दूर दूर तक खेत दिखते हैं, ज़्यादा फ़रक भी नहीं है, कम से कम खेतों में। कभी हल्के रंग दिखते हैं और कहीं गहरे धानी। फ़सल गेहूँ सी लगती है पर क...
-
“कुपुत्रो जायेत, क्वचिदपि कुमाता न भवति”, देवी दुर्गा क्षमायाचना स्तुति की ये पंक्तियाँ जैसे हमें भावार्थ सहित कंठस्थ है। और कैसे न हो जिस...
Wise old man ;)
ReplyDelete