Tuesday, July 08, 2025
Thursday, May 15, 2025
ट्रेन सफर
यह रेल यात्रा है वियेना से प्राग के लिए। ये दोनों देश, ऑस्ट्रिया और चेक, इतने आस-पास हैं कि तीन चार घंटे का सफ़र काफ़ी है एक देश से दूसरे देश जाने में। उपर से शेन्गन देश तो विज़ा/इमिग्रेशन का कोई झंझट भी नहीं। इनको तो लगता है जैसे आतंक का मतलब ही नहीं मालूम और न ही कोई प्रत्यक्ष बंदोबस्त - जैसे, न कोई बैग चेकिंग न ही वो टीं-टीं करते मेटल डिटेक्टर दरवाज़े।
यही फ़रक है शायद चारों तरफ़ दुश्मन देश से घिरे रहने में जहाँ पाकिस्तान बेवजह परेशान करता है, चीन दबाना चाहता है और बांग्लादेश चुराना चाहता है। नेपाल और श्रीलंका तो अंदर से ही घुट रहें हैं।
“टिकट प्लीज़”, एक धीमी पर कड़क आवाज़ आई और इतनी देर के बाद रेल का कोई अधिकारी दिखा। टीटी का भी अलग अंदाज़, चारों तरफ़ किसी न किसी तकनीकी यंत्र से लैस। औपचारिकता पूरी होने के बाद जब ऐलान हुआ तब समझ में आया कि ये तो निजीकरण के चोंचले हैं। ऐलान इस बात की थी कि ट्रेन १० मिनट देर से चल रही थी। ये तो है कि यहाँ समय का बड़ा महत्त्व है, हमारे यहाँ तो जो समयनिष्ठ है वो तेजा कहलाता है - सब कुछ टाइम टू टाइम! पंक्चुआलिटी हमारे यहाँ सचमुच मज़ाक़ है!
कुछ दूर चलने पर बहुत बड़े खेत नज़र आए जिनमें पीले रंग की बालियों वाले पौधे लगे थे। यश चोपड़ा के फ़िल्मों की तरह, सरसों के खेत। वो बालियाँ इतनी गहरी पीली थीं कि जैसे वो रंग ख़ुद आपकी इंद्रियों को झकझोर रहा हो - “ये लो!”। ये फिरंग सरसों का क्या करेंगे ? एक तो हल्के रंग पर सरसों तेल पीलिया सा ही लगेगा और नाक कान के लिए भी ये उपयोगी नहीं क्योंकि तो ख़ुद ही ये अपनी दवाओं से सर्दी जमा लेते हैं। न ही इनके आधुनिक तकनीक वाले दरवाज़े चूँ-चाँ करते हैं, फिर याद आया कि इन देशों में मस्टर्ड सॉस का बड़ा प्रचलन है तो शायद सरसों ही हों!
हमारा वैगन (जर्मन भाषा में कोच को वैगन कहते हैं) इकॉनमी क्लास वाला है, मतलब हमारा वाला जेनरल क्लास। बैठने के लिए सीटें हैं और लोग आराम से एसी का मज़ा लेते हुए बैठे हुए भी हैं। लेकिन ऐसा लगता है जैसे सब लोग किसी मातम का हिस्सा हैं। कोई किसी से बात नहीं करता - सब अपने मोबाइल फोन, लैपटॉप या किताबों में चिपके हैं। हम भी झिझक के कारण अपने सहयात्री से बस हैलो के अलावा कुछ नहीं बोलते हैं। अपने जेनरल क्लास में तो अभी तक मैट्रीमोनी वाले लेवल तक बात पहुँच चुकी होती!
शायद अमीरी आपके शब्दों को सूखा देता है या क्या पता अमीर और अमीर होने के उधेड़बुन में अपने आप से ही बात करते रहते हैं।
Saturday, April 19, 2025
Monday, March 10, 2025
Wednesday, October 02, 2024
दिन
बीत रहे हैं
गुज़र रहे हैं
फिसल रहे हैं
खिसक रहे हैं
लुढ़क रहे हैं
नहीं रुक रहे हैं।
हम
गिन रहे हैं
जोड़ रहे हैं
जोह रहे हैं
खो रहे हैं
आस
अब भी लगा रहे हैं।
Friday, August 23, 2024
बच गए
क्या हार में क्या जीत में
किंचित नहीं भयभीत मैं
संधर्ष पथ पर जो मिले यह भी सही वह भी सही।
Sunday, June 16, 2024
थी जगह वही
पर वीरानी लगती है।
यादों के कोरों से निकालने पर
पहचानी सी लगती है।
वही रास्ता, वही चौक
पर लोग बदले से लगते हैं
इन मोड़ों पर, दुकानों पर लोग
अब अपने नहीं लगते हैं।
बदलाव ही जीवन है
पर हम कैसे बदल जाएँ
जहां जुड़-तुड़कर बनें हम,
उस माहौल को कैसे भूल जाएँ!
जिन से थी हमारी पहचान
उन्हें खोते जा रहें हैं,
दिशाहीन धड़, कमज़ोर जड़
न इधर के न उधर के
Monday, March 18, 2024
बेकर्स डज़न
बाकी दो भाई कभी-कभी ही अवतरित होते थे। लेकिन उनमें ख़ासा फ़रक यही था कि वो काली बुलेट पर काले कपड़ों में ही आते थे। दूध दही खाया हुआ शरीर और बस अपने काम से काम। जब उनको दूध को एक कनस्तर से दूसरे में डालते देखते थे तो हमारे अबोध से मन में बड़ा ही माचो सा इमेज बनता था - कि बड़े होकर यही काम करना है! और साथ में फ़िल्मों और कहानियों में सुनी सुनाई बात वाली शंका भी उभरती थी कि ऐसे खुलेआम दूध में पानी कैसे मिला रहें हैं ये लोग!
और हमें लगता है, लगता क्या है, शर्तिया यही बात है कि हमारे अचेतन मन ने उसी इमेज से प्रोत्साहित होकर हमें काली बुलेट लेने के लिए प्रेरित किया था।
तीनों ग्वाल बंधुओं में, भैरव के नाम के अलावा, एक और समानता थी - वही बेकर्स डज़न!
उनके पास माप के लिए क़रीब एक क्वार्टर लिटर का ग्लासनुमा बर्तन था जिसे स्थानीय भाषा में पौआ कहते हैं। अब ये उनका अपराध बोध था या उदारता कि वो छह पौआ नापने के बाद, हमारी डेगची में थोड़ा ज़्यादा दूध डाल देते थे। और अगर हमने माँग की तो करीब आधा पौआ अधिक दूध दे देते थे।
ये सब सोचते हुए कुछ और बातें याद आईं कि कैसे पहले लोग सब्ज़ी ख़रीदने के बाद एक गुच्छा मिर्च, धनिया पत्ता, कुछ नहीं तो निम्बू ही उठा लेते थे। उसे भी क्या बेकर्स डज़न कहना ठीक होगा। नहीं जिस तरह से बेझिझक ये लोग अतिरिक्त आइटम उठाते थे उसे शायद बायर्स धाक कहना सही होगा।
Thursday, March 07, 2024
Prejudice
वही सशक्त है
जो सशक्त है
वही खूबसूरत!
चारदीवारी के इस तरफ
अल्फा है, बेटा है, गामा तो कई हैं
उस तरफ दबती हसरतों से उपर उठती
चाहें हैं, हौसला है,
और हॉं
बेटा और गामा की मॉं है!
तो चारदीवारी बनाने वालों
बस ये जानिए
कि जो खूबसूरत है
वही सशक्त है
जो सशक्त है
वही खूबसूरत!
Saturday, February 17, 2024
कविता
युगों की व्याख्यान
दशकों की टोह लेती है।
कहीं हर्ष
कहीं संघर्ष,
बिस्मिल कहीं,
पाश कहीं,
व्यग्र भीड़ को छंद देती है,
कविताएँ अमर होती हैं।
कभी आह्लाद;
कहीं बल
कहीं आस
शब्दों को धुन
धुनों को शब्द देती है;
कितने सपनों को पंख
कितनों को उड़ान देती है,
कविताएँ अमर होती हैं।
Monday, January 01, 2024
जुकाम
सारे पोर बंद हैं
न स्वाद है
न सुगंध है
ये जुकाम बड़ी बेरहम है।
ऑंखों में खुमारी
टूटते बदन के
हर हिस्से में ख़म है
ये जुकाम बड़ी बेरहम है।
उठती सॉंसों में
विरक्ति,
उतरती में बलगम है
ये जुकाम बड़ी बेरहम है।
Tuesday, November 21, 2023
उम्मीद
Thursday, October 19, 2023
चाय बहाना है
Thursday, August 10, 2023
आ भी जाओ कि मन नहीं लगता है
हर धुन अब शोर लगता है
ख़ुशबू की परत नहीं उड़ती,
सब बड़ा बोर लगता है
टिप्पणी के बिना कपड़ों का चयन
अब एक चोर लगता है,
रंग फिर नीला है चढ़ा
बेरंग शाम और भोर लगता है।
अदरकी चाय बनाना भी
दिलोदिमाग़ पर लोड लगता है।
आ भी जाओ
कि अब मन नहीं लगता है।
Wednesday, July 05, 2023
अब वो हाथ छुड़ाना सीख रही है
कभी झुंझलाकर,
हाथ खींच कर
कभी झटक कर,
ख़ुद अपने
रास्तों को चुन रही है,
अब वो हाथ छुड़ाना
सीख रही है।
समझ के अगले स्तर पर
अपने आप को आँक रही है,
नई नज़र से
बेफ़िकर सी
हर कदम चुनकर
स्वयं को समझ कर रही है,
अब वो हाथ छुड़ाना
सीख रही है।
आत्मविश्वास की
पहली सीढ़ी चढ़कर,
अपनी मंज़िल,
अपना सफ़र
आप ढूँढ रही है,
अब वो हाथ छुड़ाना
सीख रही है।
Monday, July 03, 2023
फिर छिड़ी बात…
लखनऊ - अवधी कल्चर का एपिसेंटर, जहॉं नवाब वाजिद अली शाह के ज़माने में जो विलासिता का दौर चला वो आज तक छूट न पाया। वो कहते हैं न कि आदत तो बाप-दादा से मिलती है और भाषा दोस्तों और पड़ोसियों से। अब मीर रौशनअली और मिरज़ा सज्जादअली के वंशजों से और क्या अपेक्षा रख सकते हैं - बिछाओ बिसात और दौड़ाओ काग़ज़ी घोड़े; फिर चाहे डल्हौज़ी अवध का विलय ही क्यों न कर रहा हो। इत्र हो, उबटन हो या चिकनकारी कुर्ते हमने सब आज़माया है पर वहाँ कभी जाना नसीब नहीं हुआ। विलासिता की बात करें तो भागलपुर लखनऊ का ही चचेरा, मौसेरा निकलेगा। वही पुरानी रईसी के क़िस्से, वही तीतर बटेर सी लड़ाई, वही बनारसी और मीठे पत्ते के छप्पन गुणों की व्याख्या।
अब तो ख़ैर बैंगलोर में बाईस साल से धड़ बसा लिया है लेकिन फिर भी कर्म से जन्म नहीं बदल पाए हैं। बात अगर महीन कारीगरी वाली हो तो हम एकाध नुक़्ताचीनी कर ही डालते हैं।
जद्दोजहद यहीं से शुरु हुई। कई दिनों से दिमाग़ में यह बात कुलबुला रही थी, ख़ासकर उस दिन जब तीन किलो मालदा और दो किलो जर्दालु आम मँगवाया था। ज़ुबान पर स्वाद चढ़ा नहीं कि फिर से हम पहुँच गए दो नम्बर गुम्टी के त्रिगांधी चौक पर। कहाँ ये रत्नागिरी और हापूस, मालदा से टक्कर लेंगे। जो बात वहाँ रहकर नहीं समझ पाए थे, ये पिछले दिनों के डोपामाइन के अमिया डोज़ ने क्लियर कर दिया था - चारे की लालच में गाय किसी भी खूँटे से बंध तो जाएगी लेकिन घर की दूब का स्वाद कभी नहीं भूलती।
हर छोटी बात जिसको हम अनदेखा कर देते थे आज दिमाग़ को कौंधा रही थी। अब जो बात बुड़बक, बकलोल में है वो ऐक्सेन्ट वाली स्ट्यूपिड में कहाँ ! यहाँ रहकर बहुत पॉलिश घिस लिया था पर इस चिकनाई के चक्कर में खुरदरा अक्खड़पन कहीं सो गया। पिछले बाईस सालों से “गोत्तिला” सीख कर, जो भाषा नहीं सीख पा रहे हैं, उसमें कहीं न कहीं इसी अक्खड़पन का दोष है। ऐसी कन्फ्यूस्ड मानसिकता से न यहीं गोते लगा पा रहे हैं और न ही वहाँ के गंगा स्नान का लुत्फ़ उठा पा रहे हैं।
एक और मोटी परत जो हमारे उपर चढ़ी है वो है अंग्रेज़ी की। बाह्य आडम्बर के लिए जो सोफ़िस्टिकेशन चाहिए वो तो अंग्रेज़ी की बैसाखी दे जाती है। लेकिन भाषा तो हमेशा से एक मिथक ही रही है, आपके चरित्र का शायद दो-चार आना! जहाँ स्तर ऊँचा करना हुआ बस दाग दिया शब्दों का मायाजाल। और आपने ज़रा सी अच्छी अंग्रेज़ी बोली कि आसपास वालों के नज़र में आपकी इज़्ज़त चौगुनी हो गई- हाय रे दो सौ साल की ग़ुलामी!
वैसे हम इस उधेड़बुन में फँसने वाले पहले किरदार नहीं है। बिरहा रस तो भोजपुरी गीतों की आत्मा थी, जो आजकल बस फुहड़पन का सस्ता बाज़ार बना हुआ है। पूर्वांचल के मज़दूर जो कैरिबियन, मॉरीशस और जाने धरती के किस किस कोने में गए। कुछ लौट गए, कुछ वहीं बस गए। उनके पीछे आस में उनके घरवालों के पास बस यही बिरहा के बिदेसिया गीत एक सहारा थे।
शब्दों का हेर फेर देखिए- परदेसिया जो बाहर से आता है, जैसे कि परदेसियों से न अँखियाँ मिलाना वाला; और बिदेसिया जो देश से निकल गया है और शायद वापस नहीं लौट पाएगा। और आज के ज़माने में हम जैसे जो देश में होकर भी न यहीं के हो पाए न वहाँ के - जिन्हें न छठ का डलिया-सूप नसीब होता है और न ही बिसी बेले बात सुहाता है। बस एक आस है शायद कि किसी दिन लौट चलेंगे, जो हमें भी पता है कि एक झूठी आस है। शायद इसलिए इस गीत के बोल मन में एक टीस भर देते हैं - “चल उड़ चल सुगना गँउवा के ओर, जहाँ माटी में सोना हेराइल बा।”
इतना आसान नहीं होता
इतना आसान नहीं होता हवाओं से हल्के मन को खुली फ़िज़ाओं में उड़ने देना! कई गिरह खोलने पड़ते हैं कई कड़ियाँ तोड़नी पड़ती हैं और देखिए विडम्बना...
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Sholay is not a movie, its a way of life...at least my life ;) Watching Sholay on the big screen (that too in 3D) was a complete e...
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दूर दूर तक खेत दिखते हैं, ज़्यादा फ़रक भी नहीं है, कम से कम खेतों में। कभी हल्के रंग दिखते हैं और कहीं गहरे धानी। फ़सल गेहूँ सी लगती है पर क...


