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Tuesday, August 18, 2026

अनुभव की गठरी

कैसे दूँ तुम्हें मैं

अपने अनुभव की गठरी ?

भरे हैं जिसमें मैंने-

मेरा गुरूर, मेरी जीत

मेरा गर्व, मेरी प्रेरणा 

मेरी ईर्ष्या,

मेरा भ्रम, मेरी ग्लानि 

मेरी ग़लतियाँ,

मेरी हार!


आधे पौने कर दूँ,

या छाँट दूँ जोड़े-चार में

नहीं तो लाद दूँ यह गठरी

एक ही बार में।

फिर लगता है कि 

ये सब तो मेरे भाव हैं,

मेरे परितोष, 

मेरे घाव हैं।

अनुभव की तो

यही है विडंबना 

खुद ही सबको बहना

जलना, डूबना और उबरना;

व्यर्थ है बस इनको सुनना!


न बाँटूँ 

तो ही बेहतर

मेरा क्षोभ, मेरा हर्ष

मेरा उल्लास, मेरा डर!

बूझो -

तो नहीं है इसमें तुम्हारी क्षति!

होती है आख़िर 

सबकी अपनी गति

अपनी ही मति! 

Monday, July 06, 2026

लाज़मी है कि तुम मुझसे बिफरे रहो!


मैं ख़ुद ही नहीं वो जो मैं पहले था
तो लाज़मी है कि तुम मुझसे बिफरे रहो!
कभी था मस्त मौला
न पीछे की सोच, न आगे का डर!
थोड़ी अकड़, थोड़ा निष्फिकर
काहे का संकोच, भरपूर जोश
अट्टहास से बिखराता क्षोभ!
अब तो ओढ़े कितनी चादरें 
डर, शक, शोक की परतें!
सफलता असफलता का बंधन
भूले बिसरे हार की धूल, जीत का चंदन
न बढ़ने देता है न टिकने!
तो कहॉं रहे हम अब पहले जैसे
और लाज़मी है कि तुम मुझसे बिफरे रहो!

Thursday, March 19, 2026

इतना आसान नहीं होता

इतना आसान नहीं होता

हवाओं से हल्के मन को

खुली फ़िज़ाओं में उड़ने देना!


कई गिरह खोलने पड़ते हैं

कई कड़ियाँ तोड़नी पड़ती हैं

और देखिए विडम्बना 

ना मन दिखता है

न ये गिरह, न कड़ियाँ।


ख़्यालों के धागों में

आप ही उलझते जाते हैं,

न कभी थी, न होगी

वैसी समस्याओं को

जाने क्यों सुलझाते हैं?


मन इन्हीं संकरी गलियों में

अवाक सा रह जाता है

बंद अंधी गलियों में

थक कर बैठ जाता है।


आग कहीं लगती है

धुआँ कहीं और उठता है

मन हमारा इन्हीं बोझ तले

दबता चला जाता है,

हवाओं से हलके मन पर

कितने मन का बोझ चढ़ जाता है।

Friday, September 26, 2025

चरित्र


कहीं छंदों का

कहीं संगों का

कहीं फूल बहार के खेलों का

चट्टानों, झील समंदर का

सुन्दर रंगीन उपवनों का

ख़ुशबू बिखेरती सुगंध का,

कभी रसीले पकवानों का।


पर जीवन नहीं जो तुमने देखा 

वो तो वही जो तुमसे गुजरा!

तुम्हें जिसने तौला

तोड़ा मरोड़ा, विच्छेद किया!

नहीं वो जो तुमने सुना

जीवन वही जिसने तुम्हें चुना,

रुकने, मुड़ने पर मजबूर किया

सपनों को चकनाचूर किया!

नहीं बिछाई फूलों की शैय्या

थाम कर रोका जिसने

अनवरत चलता नीरस सा पहिया,

ठोक बजाकर मजबूत किया

चरित्र जिसने साबूत किया।


अंधकार जब भी छाए गहन

जलाकर ख़ुदी को बनो इंधन

जब जब हो संशय, चिंता, शोक, समर

न डिगाए कोई, बस लक्ष्य शिखर!

अवरोध विशाल, भीमकाय लगे

बोझिल मन, असहाय लगे

और लगे अभाव जब किसी मित्र का

आवाहन करो उसी चरित्र का!


Thursday, September 18, 2025

उसी चौराहे पर

 कोई सपनों को अपने जी रहा है

अकड़ कर खड़ा हवाओं का रुख़ मोड़ रहा है,

लगा हुआ है कोई दौड़ भाग में

खींच तान, जोड़ तोड़ की आस में।


उठे सभी एक ही जगह से, सतह से

छूटे घरबार सबके एक ही वजह से

समेटा जितना, उसी से बढ़ना है

जमा किया जो उसी से क़िस्मत गढ़ना है।


अक्खड़, उजड्ड, साहसी थे कुछ 

धार तेज़ कर नए मैदानों में निकल गए 

बेबाक़, बेफिक्र थे कुछ; नए हथियारों से होकर लैस

नियति नई लिख, वायरल हो गए

और हम -

ठिठके एक कृति के आस में

बन कर मील का पत्थर 

थम गए, जम गए उसी चौराहे पर!

Wednesday, October 02, 2024

दिन

दिन 

बीत रहे हैं

गुज़र रहे हैं

फिसल रहे हैं

खिसक रहे हैं

लुढ़क रहे हैं

नहीं रुक रहे हैं।


हम

गिन रहे हैं

जोड़ रहे हैं

जोह रहे हैं

खो रहे हैं

आस

अब भी लगा रहे हैं।

Sunday, June 16, 2024

थी जगह वही

थी जगह वही
पर वीरानी लगती है।
यादों के कोरों से निकालने पर
पहचानी सी लगती है।

वही रास्ता, वही चौक
पर लोग बदले से लगते हैं
इन मोड़ों पर, दुकानों पर लोग
अब अपने नहीं लगते हैं।


बदलाव ही जीवन है

पर हम कैसे बदल जाएँ 

जहां जुड़-तुड़कर बनें हम,

उस माहौल को कैसे भूल जाएँ!


जिन से थी हमारी पहचान

उन्हें खोते जा रहें हैं,

दिशाहीन धड़, कमज़ोर जड़

न इधर के न उधर के

जाने हम क्या होते जा रहे हैं!

Thursday, March 07, 2024

Prejudice

 
जानिए कि जो खूबसूरत है 

वही सशक्त है

जो सशक्त है 

वही खूबसूरत!

चारदीवारी के इस तरफ

अल्फा है, बेटा है, गामा तो कई हैं

उस तरफ दबती हसरतों से उपर उठती 

चाहें हैं, हौसला है,

और हॉं

बेटा और गामा की मॉं है!

तो चारदीवारी बनाने वालों

बस ये जानिए 

कि जो खूबसूरत है 

वही सशक्त है

जो सशक्त है 

वही खूबसूरत!

Saturday, February 17, 2024

कविता

कविताएँ अमर होती हैं -
युगों की व्याख्यान
दशकों की टोह लेती है।
कहीं हर्ष 
कहीं संघर्ष,
बिस्मिल कहीं,
पाश कहीं,
व्यग्र भीड़ को छंद देती है,

कविताएँ अमर होती हैं।


कभी विषाद
कभी आह्लाद;
कहीं बल
कहीं आस
शब्दों को धुन
धुनों को शब्द देती है;
कितने सपनों को पंख
कितनों को उड़ान देती है,
कविताएँ अमर होती हैं।

Tuesday, November 21, 2023

उम्मीद

उम्मीद समर
उम्मीद भँवर 
उम्मीद सफ़र 
उम्मीद ही हल।

उम्मीद जीवन
उम्मीद किरण 
उम्मीद रंग
बस उम्मीद ही संग।

उम्मीद राग
उम्मीद से आग
उम्मीद विवाद
उम्मीद ही वाद।

उम्मीद पहल
उम्मीद सबल
उम्मीद के आगे
व्यर्थ जिरह।



उम्मीद की एक और लड़ी- (सधन्यवाद पापा)

उम्मीद है रंग
उम्मीद तरंग
जीवन का यह प्रसंग
उम्मीद चाह
उम्मीद राह
जीवन का यह प्रवाह
उम्मीद ही रीति 
उम्मीद ही नीति 
उम्मीद से प्रीति

Thursday, October 19, 2023

चाय बहाना है

चाय बहाना है
दिनचर्या सुनाने का
किसने, किससे, क्या कहा
बताने का
शीत युद्ध में
थोड़ी गर्माहट लाने का।

चाय बहाना है
सुनने सुनाने का
कैसा रहा आज
और ट्रैफ़िक वाली बात
कितने कॉल्स आज रात
रूटीन सी दिन को
स्पेशल बनाने का।


Thursday, August 10, 2023

आ भी जाओ कि मन नहीं लगता है

वैरायटी की कमी है
हर धुन अब शोर लगता है
ख़ुशबू की परत नहीं उड़ती,
सब बड़ा बोर लगता है
टिप्पणी के बिना कपड़ों का चयन
अब एक चोर लगता है,
रंग फिर नीला है चढ़ा
बेरंग शाम और भोर लगता है।
अदरकी चाय बनाना भी
दिलोदिमाग़ पर लोड लगता है।
 भी 
जाओ
कि अब मन नहीं लगता है।

Wednesday, July 05, 2023

अब वो हाथ छुड़ाना सीख रही है

चीख चिल्लाकर

कभी झुंझलाकर,

हाथ खींच कर 

कभी झटक कर,

ख़ुद अपने 

रास्तों को चुन रही है,

अब वो हाथ छुड़ाना

सीख रही है।


समझ के अगले स्तर पर

अपने आप को आँक रही है,

नई नज़र से

बेफ़िकर सी

हर कदम चुनकर

स्वयं को समझ कर रही है,

अब वो हाथ छुड़ाना

सीख रही है।


आत्मविश्वास की

पहली सीढ़ी चढ़कर,

अपनी मंज़िल,

अपना सफ़र 

आप ढूँढ रही है,

अब वो हाथ छुड़ाना

सीख रही है।

सब कुछ

हाड़ मांस का ये शरीर   प्राण जैसा कुछ तो है कहते हैं जिसको आत्मा  जान गए तो सब कुछ है। नासमझी की है रैली पुरज़ोर है आडम्बर, बह गए तो व्यर्थ ...