दिन
बीत रहे हैं
गुज़र रहे हैं
फिसल रहे हैं
खिसक रहे हैं
लुढ़क रहे हैं
नहीं रुक रहे हैं।
हम
गिन रहे हैं
जोड़ रहे हैं
जोह रहे हैं
खो रहे हैं
आस
अब भी लगा रहे हैं।
कैसे दूँ तुम्हें मैं अपने अनुभव की गठरी ? भरे हैं जिसमें मैंने- मेरा गुरूर, मेरी जीत मेरा गर्व, मेरी प्रेरणा मेरी ईर्ष्या, मेरा भ्रम, मेरी ...
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