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Tuesday, August 18, 2026

अनुभव की गठरी

कैसे दूँ तुम्हें मैं

अपने अनुभव की गठरी ?

भरे हैं जिसमें मैंने-

मेरा गुरूर, मेरी जीत

मेरा गर्व, मेरी प्रेरणा 

मेरी ईर्ष्या,

मेरा भ्रम, मेरी ग्लानि 

मेरी ग़लतियाँ,

मेरी हार!


आधे पौने कर दूँ,

या छाँट दूँ जोड़े-चार में

नहीं तो लाद दूँ यह गठरी

एक ही बार में।

फिर लगता है कि 

ये सब तो मेरे भाव हैं,

मेरे परितोष, 

मेरे घाव हैं।

अनुभव की तो

यही है विडंबना 

खुद ही सबको बहना

जलना, डूबना और उबरना;

व्यर्थ है बस इनको सुनना!


न बाँटूँ 

तो ही बेहतर

मेरा क्षोभ, मेरा हर्ष

मेरा उल्लास, मेरा डर!

बूझो -

तो नहीं है इसमें तुम्हारी क्षति!

होती है आख़िर 

सबकी अपनी गति

अपनी ही मति! 

Wednesday, July 05, 2023

अब वो हाथ छुड़ाना सीख रही है

चीख चिल्लाकर

कभी झुंझलाकर,

हाथ खींच कर 

कभी झटक कर,

ख़ुद अपने 

रास्तों को चुन रही है,

अब वो हाथ छुड़ाना

सीख रही है।


समझ के अगले स्तर पर

अपने आप को आँक रही है,

नई नज़र से

बेफ़िकर सी

हर कदम चुनकर

स्वयं को समझ कर रही है,

अब वो हाथ छुड़ाना

सीख रही है।


आत्मविश्वास की

पहली सीढ़ी चढ़कर,

अपनी मंज़िल,

अपना सफ़र 

आप ढूँढ रही है,

अब वो हाथ छुड़ाना

सीख रही है।

Saturday, January 07, 2023

अब वो बातें बनाना सीख रही है

दो में दो जोड़ पाँच कर रही है,
मीठी चाशनी में घोल
जबेली सी मोड़ दे रही है;
आँखों को गोल-गोल कर
हाथों को इधर-उधर फेंक,
शब्दों में भाव भर रही है,
अब वो बातें बनाना सीख रही है।

क़िस्से गज दो गज से,
कभी हल्के, कभी भरकम

तौलकर, कभी नापकर

आड़े-तिरछे कभी बुनकर,

अपने भुने मसालों को 

जैसे चखकर;

रसीले पकवान परोस रही है,

अब वो बातें बनाना सीख रही है ।

Tuesday, September 08, 2020

मेरा नया बचपन


कभी-कभी उन यादों में

मन भटक-भटक सा जाता है

जब दिन सुनहरे होते थे,

शामों में ख़ुशबू तैरती थी

रातों में गीतों और सुरों की

निश्छल चॉंदनी छलकती थी।

बचपन के उन अनमोल पलों में

जब मन भेद नहीं जानता था,

उत्साह, जोश के धवल रंगों में

दिशाहीन, दौड़ता फिरता था।


एकविध इस जीवन में

बचपन फिर मिल ही जाता है।

किलकारी किल्लौल में जैसे

दिल रम सा जाता है।

मन बोझिल जब भी होता है

और बिटिया दौड़ 

गले लग जाती है;

मन को शीतल,

चित्त को प्रफुल्लित कर जाती है।

पेट, छाती और तन पर

कूद, कुलाँचे मारती है,

अपने नन्हीं बोझरहित काया से

हर बोझ हवा कर जाती है।


दिन फिर सुनहरे हो जाते हैं,

शामों में ख़ुशबू भर जाती है

रातों में नवल गीतों और 

सुरों की अल्हड़ चॉंदनी,

खूब छलकती जाती है।

इन खुशियों के पल का फिर

नया ही मोल मिल जाता है!

Thursday, August 06, 2020

अब वो रुठना सीख रही है

जो बात कभी
न हो मन की,
या उसकी लय धुन में
रोक टोक हो
किसी परिजन की;

मुँह फुलाए,
चेहरा तमतमाए
कभी एक कोने में
सिमटकर,
कभी दूर भाग कर सबसे
झुंझलाते चीखते,
चीजों को फेंकना सीख रही है

अब वो रुठना सीख रही है।

Monday, March 09, 2020

मार्ग पट

ख़ुद टूटा बिखरा हूँ,
कैसे तुम्हें सहेजूँगा ।
हार का स्वाद जीव्हा पर मेरे,
जीत कैसे तुम्हें चखाऊँगा ।
हाथ संकोच ने है जकड़े मेरे,
परों को कैसे उड़ान दे पाऊँगा ।
ज़बान पर सोच का है बोझ पड़ा,
तुम्हें बेबाक कैसे बनाऊँगा!

हॉं ये है मेरे अनुभव का लेखा
ऊँच नीच जो भी मैंने देखा
तौल नापकर तुम्हें है आंकना
राह प्रशस्त आप तुम्हें है करना।

Friday, March 06, 2020

अब वो बोलना सीख रही है!

होंठ, जीव्हा, तालु में
हवा भर, उन्हें स्वर दे रही है
अब वो बोलना सीख रही है।
गौर से कभी सुनकर,
कभी यूँ ही अक्षरों को जोड़ तोड़ कर,
शब्दावली का विस्तार कर रही है
अब वो बोलना सीख रही है!
व्यक्त करने के नए माध्यम का
अवलोकन खूब कर रही है
अब वो बोलना सीख रही है!

Thursday, December 26, 2019

पीकू का झरोखा

सुबह का है नज़ारा, पीकू
देखो कितना प्यारा
वो बैग लटका कर
कैसे मुन्नी दौड़ लगाए
उधर घसीट कर पैरों को
मुन्ने की ईप्सा है कि
बस छूट जाए।

सेहत की आस में
देखो कोई द्रुत कदम बढ़ाए,
कोई सिर्फ कपड़ों की आड़ में
जैसे कपड़ों को ही टहलाए।

दिनचर्या की दौड़ भाग से दूर 
कोई चिंतन में खो जाए,
खिलखिलाती धूप की आस में
देखो कबूतर, कुत्ते भी आए।

दुनिया का रंग पीकू
है देखो कितना अनोखा
तुम्हें देखना-सीखना
अभी है बहुत,
ये जो है तुमने देखा
बस है एक झलक, एक झरोखा।

Thursday, November 07, 2019

महंगा सौदा

जीवन की सबसे बड़ी पूँजी 
हर सुबह 
किसी और के हाथ
छोड़ आता हूँ
जाने इस महंगे सौदे में 
कितना खोता हूँ
और क्या कमाता हूँ?

आज की फ़िक्र नहीं
कल की आस में
आसमान काटता हूँ;
जानता हूँ 
मृगतृष्णा है कल,
फिर भी खुद को बहलाता हूँ ।
जाने इस महंगे सौदे में 
कितना खोता हूँ
और क्या कमाता हूँ?

सब कुछ

हाड़ मांस का ये शरीर   प्राण जैसा कुछ तो है कहते हैं जिसको आत्मा  जान गए तो सब कुछ है। नासमझी की है रैली पुरज़ोर है आडम्बर, बह गए तो व्यर्थ ...