क्यों डरे है ज़िन्दगी में क्या होगा, कुछ न होगा तो तजुर्बा तो होगा।
सारे पोर बंद हैं
न स्वाद है
न सुगंध है
ये जुकाम बड़ी बेरहम है।
ऑंखों में खुमारी
टूटते बदन के
हर हिस्से में ख़म है
उठती सॉंसों में
विरक्ति,
उतरती में बलगम है
मैं ख़ुद ही नहीं वो जो मैं पहले था तो लाज़मी है कि तुम मुझसे बिफरे रहो! कभी था मस्त मौला न पीछे की सोच, न आगे का डर! थोड़ी अकड़, थोड़ा निष्फ...