Monday, July 06, 2026

लाज़मी है कि तुम मुझसे बिफरे रहो!


मैं ख़ुद ही नहीं वो जो मैं पहले था
तो लाज़मी है कि तुम मुझसे बिफरे रहो!
कभी था मस्त मौला
न पीछे की सोच, न आगे का डर!
थोड़ी अकड़, थोड़ा निष्फिकर
काहे का संकोच, भरपूर जोश
अट्टहास से बिखराता क्षोभ!
अब तो ओढ़े कितनी चादरें 
डर, शक, शोक की परतें!
सफलता असफलता का बंधन
भूले बिसरे हार की धूल, जीत का चंदन
न बढ़ने देता है न टिकने!
तो कहॉं रहे हम अब पहले जैसे
और लाज़मी है कि तुम मुझसे बिफरे रहो!

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