इतना आसान नहीं होता
हवाओं से हल्के मन को
खुली फ़िज़ाओं में उड़ने देना!
कई गिरह खोलने पड़ते हैं
कई कड़ियाँ तोड़नी पड़ती हैं
और देखिए विडम्बना
ना मन दिखता है
न ये गिरह, न कड़ियाँ।
ख़्यालों के धागों में
आप ही उलझते जाते हैं,
न कभी थी, न होगी
वैसी समस्याओं को
जाने क्यों सुलझाते हैं?
मन इन्हीं संकरी गलियों में
अवाक सा रह जाता है
बंद अंधी गलियों में
थक कर बैठ जाता है।
आग कहीं लगती है
धुआँ कहीं और उठता है
मन हमारा इन्हीं बोझ तले
दबता चला जाता है,
हवाओं से हलके मन पर
कितने मन का बोझ चढ़ जाता है।
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