थकी हुई इन लाल आंखों में
मैं आशा की किरण देखता हूँ
कहीं विचारों का सैलाब
कहीं अनकहे शब्दों की कतार देखता हूँ
अनछुए सपनों को मुष्टिगत करने की चाह
तो कहीं और ऊंची उडान देखता हूँ
अश्रुपूर्ण इन लाल आंखों में
मैं उम्मीद की मोड़ देखता हूँ
दबी बिछड़ी इच्छाओं को -
उछल कर पकड़ने का जोश देखता हूँ
Tuesday, September 25, 2007
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लाज़मी है कि तुम मुझसे बिफरे रहो!
मैं ख़ुद ही नहीं वो जो मैं पहले था तो लाज़मी है कि तुम मुझसे बिफरे रहो! कभी था मस्त मौला न पीछे की सोच, न आगे का डर! थोड़ी अकड़, थोड़ा निष्फ...
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Sholay is not a movie, its a way of life...at least my life ;) Watching Sholay on the big screen (that too in 3D) was a complete e...
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“कुपुत्रो जायेत, क्वचिदपि कुमाता न भवति”, देवी दुर्गा क्षमायाचना स्तुति की ये पंक्तियाँ जैसे हमें भावार्थ सहित कंठस्थ है। और कैसे न हो जिस...
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दूर दूर तक खेत दिखते हैं, ज़्यादा फ़रक भी नहीं है, कम से कम खेतों में। कभी हल्के रंग दिखते हैं और कहीं गहरे धानी। फ़सल गेहूँ सी लगती है पर क...