प्राण जैसा कुछ तो है
कहते हैं जिसको आत्मा
जान गए तो सब कुछ है।
नासमझी की है रैली
पुरज़ोर है आडम्बर,
बह गए तो व्यर्थ है
आत्मविश्वास की डोर पकड़
जो डटे रहे तो सब कुछ है।
माया का है जाल
कोशिश है बेकार
जो फँसा रहा
वही उलझा
जो न जुड़े तो सब कुछ है।
क्यों डरे है ज़िन्दगी में क्या होगा, कुछ न होगा तो तजुर्बा तो होगा।
प्राण जैसा कुछ तो है
कहते हैं जिसको आत्मा
जान गए तो सब कुछ है।
नासमझी की है रैली
पुरज़ोर है आडम्बर,
बह गए तो व्यर्थ है
आत्मविश्वास की डोर पकड़
जो डटे रहे तो सब कुछ है।
माया का है जाल
कोशिश है बेकार
जो फँसा रहा
वही उलझा
जो न जुड़े तो सब कुछ है।
कैसे दूँ तुम्हें मैं
अपने अनुभव की गठरी ?
भरे हैं जिसमें मैंने-
मेरा गुरूर, मेरी जीत
मेरा गर्व, मेरी प्रेरणा
मेरी ईर्ष्या,
मेरा भ्रम, मेरी ग्लानि
मेरी ग़लतियाँ,
मेरी हार!
आधे पौने कर दूँ,
या छाँट दूँ जोड़े-चार में
नहीं तो लाद दूँ यह गठरी
एक ही बार में।
फिर लगता है कि
ये सब तो मेरे भाव हैं,
मेरे परितोष,
मेरे घाव हैं।
अनुभव की तो
यही है विडंबना
खुद ही सबको बहना
जलना, डूबना और उबरना;
व्यर्थ है बस इनको सुनना!
न बाँटूँ
तो ही बेहतर
मेरा क्षोभ, मेरा हर्ष
मेरा उल्लास, मेरा डर!
बूझो -
तो नहीं है इसमें तुम्हारी क्षति!
होती है आख़िर
सबकी अपनी गति
बात उस समय की है जब टेलीफोन लाल फीताशाही की गिरफ़्त में था और कनेक्शन के लिए बहुत लंबी जद्दोजहद होती थी। दूरसंचार विभाग में जाकर नंबर लगाने के बाद अगर आप आम आदमी हैं तो कम से कम साल भर इंतज़ार करना होता था।
तो जब हम तिलकामाँझी में रहते थे तो पापा ने नंबर लगाना भी अनिवार्य नहीं समझा। पड़ोस में बहुत दूर दूर से रिश्तेदार लगने वाले और ज़्यादा नज़दीकी बैंक कनेक्शन के कारण हम उनको तिवारी बाबा कहते थे। ये बात अलग है कि ख़ासकर उनसे, शायद एकाध बार ही मुलाक़ात हुई हो और उस मुलाक़ात में भी उन्हें तो बाबा बोलने का मौक़ा भी नहीं मिला; हाँ मगर उनके घर का नाम तिवारी बाबा का घर हो गया और उनका फ़ोन हमारा।
घर बड़ा ही आलीशान था, बड़ा हाता, कुछ फूलों के पौधे और पेड़ों के बीच दो मंज़िला मकान जिसमें ऊपर वाले महले में तिवारी परिवार रहता था- तीन लड़कियां, दो लड़के और एक नाती के साथ। उनका नाती चंदन हमारा दोस्त था - दोस्त तो शायद वो भैया का था हम तो बस टंडेली करते हुए दोस्त बने हुए थे।
ऊपरी मंज़िल के चारों ओर एक रनिंग बालकनी थी और हमारे घर की तरफ उनका डाइनिंग हॉल भी पड़ता था। हमको ठीक-ठीक याद नहीं कि उस परिवार से घनिष्ठता कब बढ़ी लेकिन ये ज़रूर याद है कि नवासी के दंगे के समय मोहल्ले के कई परिवार को उन्होंने ही आश्रय दिया था। घनिष्ठता यूँ थी कि तिवारी बाबा की दोनों बेटियों (तीसरी की शादी हो गई थी और उन्हीं का बड़ा बेटा चंदन हमारा दोस्त था) को हमलोग दीदी बोलते थे - गुड्डी दीदी और रीना दीदी और उनके लड़कों को चाचा - उदय चच्चा और लल्लू चच्चा! और कुछ न कुछ आदान ज़्यादा और प्रदान कम हमारे बीच चलता ही रहता था। जैसे किसी आयुर्वेद के ज्ञानी ने हमारे घुटने और कोहनी के बैंगनकाँटे के लिए अड़हुल की कलि को पानी के साथ निगलने का नुस्ख़ा बताया था तो वो कलियाँ तिवारी बाबा के घर से ही आती थीं। लेकिन सबसे महत्वपूर्ण आदान तो उनके फ़ोन का ही था।
“भाभी आपका फोन आया है, नाथनगर से”, अक्सर गुड्डी दीदी या उदय चाचा उस रनिंग बालकनी से आवाज़ लगाते थे। प्रोटोकॉल ये होता था कि फ़ोन करके पहले बता दीजिए कि फ़लाँ जगह से बोल रहे हैं और पाँच मिनट बाद फिर फ़ोन करेंगे, आप उनको बुला दीजिए। बात अब अचंभित करती है लेकिन उस वक़्त इस प्रोटोकॉल से किसी को कोई संकोच या आपत्ति भी नहीं होती थी।
तिलकामाँझी से जब हम भीखनपुर आ गए तब तक वो ९१ वाला आर्थिक उदारीकरण काल आ चुका था। तो हमारे पास भी टेलीफ़ोन आ गया था - पहले कुछ साल मटमैला सेट और फिर लाल सेट वाला फ़ोन। जब नंबर मिला तो हमें लगा कैसे याद होगा ये छह अंक वाला नंबर, और जो याद हुआ तो आज तक याद है - ४२९४६७! उदारीकरण के बाद भी वैसे कुछ ख़ामियाँ रह ही गईं थीं जैसे उस फोन में एस टी डी कनेक्शन। उसकी ज़रूरत तब महसूस हुई जब पापा का तबादला राँची हो गया। अब उसके लिए एक दूसरा जुगाड़ हुआ- पापा के ही परिचित थे जिनके घर पर यह सुविधा थी पर उनका घर तिवारी बाबा के घर के जैसे पड़ोस में नहीं था। प्रोटोकॉल में अब पाँच की जगह पंद्रह मिनट का अंतराल रखा जाता था, जिस दरम्यान उनका एक नौकर घर पर आवाज़ लगाता था - “आपका फ़ोन आया है, राँची से”! पापा के वापस स्थानांतरण तक हमारे यहाँ भी एसटीडी कनेक्शन आ गया था, जिसका पूरा श्रेय हम देंगे श्रीमान अमिताभ बच्चन को। आख़िर कौन बनेगा करोड़पति शुरू हो चुका था और हमें फ़ोन लगाकर अपनी क़िस्मत भी तो टटोलनी थी।
अभी सोचने पर लगता है कि क्या बेहतरीन सोशल नेटवर्क था ये। मतलब फ़ोन रिसीव करने के बहाने गप शप और कुछ रिफ़्रेशमेंट भी हो ही जाता था और हर कॉल के साथ घनिष्ठता बढ़ती ही जाती थी। फिर तो हमारे फ़ोन पर भी पड़ोसियों के कॉल रिसीव होने लगे - उसी पाँच-दस मिनट वाले प्रोटोकॉल के तहत! हमारे बैंगलोर आते आते तो घर के छह अंकों का फ़ोन नंबर सात का हो गया - २४२९४६७, बस एक अंक का बदलाव। बड़ा बदलाव तब आया जब दस अंकों के मोबाइल नंबर्स आ गए, जिनको याद करना बड़ा ही कठिन था तो साथ में आ गए डिजिटल फ़ोन बुक, खुद फ़ोन पर ही। फिर आधार, पैन, पासवर्ड और न जाने क्या-क्या! इन अंकों के सैलाब में फँसा एक आम आदमी शायद बस अपना ही मोबाइल नंबर याद रख पाए। अब २१४०९ वाली न सरलता रही, और न ही ऑरिजिनल सोशल नेटवर्क और न वो प्रोटोकॉल- “आपका फ़ोन आया है”!
हवाओं से हल्के मन को
खुली फ़िज़ाओं में उड़ने देना!
कई गिरह खोलने पड़ते हैं
कई कड़ियाँ तोड़नी पड़ती हैं
और देखिए विडम्बना
ना मन दिखता है
न ये गिरह, न कड़ियाँ।
ख़्यालों के धागों में
आप ही उलझते जाते हैं,
न कभी थी, न होगी
वैसी समस्याओं को
जाने क्यों सुलझाते हैं?
मन इन्हीं संकरी गलियों में
अवाक सा रह जाता है
बंद अंधी गलियों में
थक कर बैठ जाता है।
आग कहीं लगती है
धुआँ कहीं और उठता है
मन हमारा इन्हीं बोझ तले
दबता चला जाता है,
हवाओं से हलके मन पर
कितने मन का बोझ चढ़ जाता है।
कहीं छंदों का
कहीं संगों का
कहीं फूल बहार के खेलों का
चट्टानों, झील समंदर का
सुन्दर रंगीन उपवनों का
ख़ुशबू बिखेरती सुगंध का,
कभी रसीले पकवानों का।
पर जीवन नहीं जो तुमने देखा
वो तो वही जो तुमसे गुजरा!
तुम्हें जिसने तौला
तोड़ा मरोड़ा, विच्छेद किया!
नहीं वो जो तुमने सुना
जीवन वही जिसने तुम्हें चुना,
रुकने, मुड़ने पर मजबूर किया
सपनों को चकनाचूर किया!
नहीं बिछाई फूलों की शैय्या
थाम कर रोका जिसने
अनवरत चलता नीरस सा पहिया,
ठोक बजाकर मजबूत किया
चरित्र जिसने साबूत किया।
अंधकार जब भी छाए गहन
जलाकर ख़ुदी को बनो इंधन
जब जब हो संशय, चिंता, शोक, समर
न डिगाए कोई, बस लक्ष्य शिखर!
अवरोध विशाल, भीमकाय लगे
बोझिल मन, असहाय लगे
और लगे अभाव जब किसी मित्र का
आवाहन करो उसी चरित्र का!
कुनबा बहुत बड़ा था - आठ बहनों और तीन भाइयों का परिवार जिसमें औसतन हर परिवार में तीन-चार बच्चे; बहुलक देखें तो सात-आठ हो। मेरे ननिहाल नाथनगर में दुर्गा पूजा मिलने मिलाने के अलावा देखने दिखाने, जिसके लिए आंग्ल शब्द - शो ऑफ ज्यादा सटीक बैठता है, के लिए बहुत अच्छा स्टेज था। साथ में पूजा के माहौल में कुछ कहा सुनी हो जाए तो मामला शांत भी बहुत जल्दी होता था। आख़िर देवी आई हैं पूरे साल भर बाद उनके सामने तो कम से कम शिष्ट बनिए।
हमारे कुछ मौसेरे भाईयों की शिक्षा दीक्षा अपने ननिहाल में ही हुई थी। तो ममेरे और मौसेरे भाई बहनों का बहुत बड़ा ग्रुप वहाँ रहता था। दशहरा के समय हम सब इकट्ठे हो जाते तो करीब करीब एक मुहल्ले भर जितने बच्चे हो जाते थे। अब इतना बड़ा सैम्पल स्पेस हो तो उम्र को तो गॉसियन डिस्ट्रिब्यूशन का ही अनुसरण करना होगा। उस वक़्त बच्चों की उम्र की रेंज पॉंच से लेकर पच्चीस तक की थी, और ज़्यादातर बच्चे दस से पंद्रह की कैटेगरी में। बहुत कम उसमें अंग्रेज़ी स्कूल वाले और सबसे ज़्यादा गुरुकुल वाले बच्चे थे। गुरुकुल वहाँ का राजकीय माध्यमिक विद्यालय था। हम अंग्रेज़ी मीडियम वालों के लिए गुरुकुल की कहानियाँ बड़ी कूल लगती थी कि कैसे ये लोग झोला, बस्ता या कभी-कभी हाथ में ही किताब लेकर स्कूल जाते हैं, कैसे अक्सर नीचे फर्श पर बैठना होता है और कभी-कभी तो बिना किसी को बताए भाग निकलना भी होता है। और फिर सरकारी स्कूल वाली हेकड़ी - “तुम जानता है हम किसके भाई हैं?”। इन कहानियों के सामने क्या हार्डी ब्यॉज़ और क्या फेमस फ़ाइव! एक ही भेंट में साल भर की ज्ञानोपलब्धि हो जाती थी और नए शब्दों की विश्लेषण सहित जानकारी, फिर सांसारिक विधाओं की शिक्षा अलग! कुछ सात्विक और धार्मिक ज्ञान नाना बाबू और बुजुर्गों से भी मिल जाता था। मन इस भंडार से एकदम ओतप्रोत होने के बाद भी अगली भेंट के लिए विह्वल ही रहता था।
पूजा के समय का मौसम भी बहुत सुहावना होता है। पीली धूप, सफेद बादल, नीला आकाश, जितने भी रंग हम आसानी से देख पाते हैं सब दिखता था। कभी-कभी अगर दुर्गा माँ का आगमन नाव पर होता तो रात भर की बारिश के बाद पूरी दुनिया नहाई धुली लगती थी। हमें उसी दौरान दुर्गा माँ के वाहनों की बहुत ही नायाब जानकारी मिली थी। हर साल दुर्गा माँ सिंह पर सवार होकर नहीं आती हैं उनके तो वाहनों में बाघ, हाथी और यहाँ तक की नाव भी होते हैं। हर वाहन का अलग महत्त्व- मसलन वो हाथी से आईं तो धरती डोलने मतलब भूकंप की संभावना होती, अगर नाव से तो बाढ़ आने की आशंका और अगर घोड़े से तो फिर बहुत भयंकर बदलाव। नब्बे इक्यानवे में जिस तरह की राजनीतिक उथल पुथल हुई थी उससे तो यही लगता है कि उस साल दुर्गा माँ घोड़े पर सवार होकर ही आई होंगी।
सप्तमी और अष्टमी के दिन पूजा पूरे परवान पर रहता है। एकाध साल ऐसा हुआ था कि हमलोग सप्तमी में वहीं रुक गए थे तो कई नए अनुभवों का मज़ा लिया। जैसे बिल्कुल मुँह अँधेरे उठकर पूरी टोली के साथ फूलों और बेलपत्र की खोज में निकल जाना। उसी दौरान हमें पता चला था कि तेज नारायण बनैली कॉलेज और तिलका मांझी यूनिवर्सिटी अलग हैं और इतना बड़ा प्रांगण है कि वहाँ लोग भटक भी जाएँ। उस बार सुबह इन परिसरों की चारदीवारी को लाँघ कर हमारी पूरी टोली फूलों की खोज में निकली थी। हमारे भाईयों में कई इतने ज्ञानी थे कि उन्हें ये भी पता था कि कौन से फूल देवी को चढ़ा सकते हैं और कौन नहीं! उस बार तो भटकते हुए हम यूनिवर्सिटी के कैंपस में भी पहुँच गए थे। पहली बार टिल्हा कोठी भी देखी और गंगा का विस्तार भी।
“ऐ बुड़बक! टिल्हा कोठी नहीं जानता है - अरे गुरुदेव यहीं गीतांजलि का रचना किये थे, इसीलिए तो इसको अब सबलोग रविंद्र भवन बोलता है।”
एक पोखर भी दिखा था जिसमें जल क्रीड़ा करते हुए कुछ भैंस भी दिखे थे। बाद में पता चला कि वही यूनिवर्सिटी क्रिकेट ग्राउंड है जहाँ आने वाले दिनों में कई रोमांचक मुक़ाबले हुए थे, जिनमें से एक हमारी स्कूल क्रिकेट टीम का भी ऐतिहासिक मैच था। इतना इतिहास, भूगोल जानने में समय का पता ही नहीं चला और जब तक हम फूल, बेलपत्र लेकर वापस पहुँचे तब तक आरती का भी समय हो गया था। आनन फ़ानन में कोई दौड़ता हुआ घड़ीघंट उठाने भागा, कोई शंख, कोई घंटी तो कोई आरती की किताब! इन्हीं आरतियों में हमने ओजपूर्ण संस्कृत उच्चारण और “तुम्हारे भक्तजनों में हमसे बढ़कर कौन” वाला प्रदर्शन देखा था। जहाँ बाक़ी स्तुति तो धुन के साथ दबी आवाज़ में गाए जाते थे लेकिन क्षमा याचना आते ही कुपुत्रों वाली पंक्ति पर सारा ज़ोर लगा दिया जाता था।
कुछ चीज़ों की अगर आज वर्णन करने बैठे तो कपोलकल्पना ही लगेगी - जैसे देवी के लिए बलि, रात भर घी के दिये का जलना, इतने बड़े परिवार का एक साथ सम्मिलित होना। हाँ, अब तो परिवार में शादी हो तब भी पूरा कुनबा नहीं जुट पाता है। दशहरा अब भी सुनहरे दिनों के साथ आता है लेकिन अब न वो घर रहा, न लोग। अब हम आदि शंकराचार्य की स्तुति का सही महत्त्व समझते हैं - न मंत्र जानते हैं न यंत्र, न आवाहन न ध्यान, बस अनुसरण करना जानते हैं क्योंकि हमको पता है कि कुपुत्र कई हो गए हों पर शशि ललाट माँ कभी भी कुमाता नहीं हो सकतीं।
अकड़ कर खड़ा हवाओं का रुख़ मोड़ रहा है,
लगा हुआ है कोई दौड़ भाग में
खींच तान, जोड़ तोड़ की आस में।
उठे सभी एक ही जगह से, सतह से
छूटे घरबार सबके एक ही वजह से
समेटा जितना, उसी से बढ़ना है
जमा किया जो उसी से क़िस्मत गढ़ना है।
अक्खड़, उजड्ड, साहसी थे कुछ
धार तेज़ कर नए मैदानों में निकल गए
बेबाक़, बेफिक्र थे कुछ; नए हथियारों से होकर लैस
नियति नई लिख, वायरल हो गए
और हम -
ठिठके एक कृति के आस में
बन कर मील का पत्थर
थम गए, जम गए उसी चौराहे पर!
हाड़ मांस का ये शरीर प्राण जैसा कुछ तो है कहते हैं जिसको आत्मा जान गए तो सब कुछ है। नासमझी की है रैली पुरज़ोर है आडम्बर, बह गए तो व्यर्थ ...