हाड़ मांस का ये शरीर
प्राण जैसा कुछ तो है
कहते हैं जिसको आत्मा
जान गए तो सब कुछ है।
नासमझी की है रैली
पुरज़ोर है आडम्बर,
बह गए तो व्यर्थ है
आत्मविश्वास की डोर पकड़
जो डटे रहे तो सब कुछ है।
माया का है जाल
कोशिश है बेकार
जो फँसा रहा
वही उलझा
जो न जुड़े तो सब कुछ है।