Sunday, December 12, 2010

कसूर

ह्रदय विदारक दृश्य न था,
ग्लानी क्यों थी फिर?
गोद में वो बिलखता भी तो न था,
मुँह फेर लिया बस,
ज़िम्मेदारी मेरी क्यूँ हो?

चेहरा बनावटी था -
हाँ बनावटी ही तो था,
आंसू सूखे होते तो
कोई चिन्ह तो होता ही ।

हमारा ही बोझ होगा,
नज़रें झुकी ही रह गयी,
कोशिश हमारी क्यों रहती,
उनके कर्म हैं, दोष हम क्यों लें?

सब कुछ

हाड़ मांस का ये शरीर   प्राण जैसा कुछ तो है कहते हैं जिसको आत्मा  जान गए तो सब कुछ है। नासमझी की है रैली पुरज़ोर है आडम्बर, बह गए तो व्यर्थ ...