दिन
बीत रहे हैं
गुज़र रहे हैं
फिसल रहे हैं
खिसक रहे हैं
लुढ़क रहे हैं
नहीं रुक रहे हैं।
हम
गिन रहे हैं
जोड़ रहे हैं
जोह रहे हैं
खो रहे हैं
आस
अब भी लगा रहे हैं।
बीत रहे हैं
गुज़र रहे हैं
फिसल रहे हैं
खिसक रहे हैं
लुढ़क रहे हैं
नहीं रुक रहे हैं।
हम
गिन रहे हैं
जोड़ रहे हैं
जोह रहे हैं
खो रहे हैं
आस
अब भी लगा रहे हैं।
हाड़ मांस का ये शरीर प्राण जैसा कुछ तो है कहते हैं जिसको आत्मा जान गए तो सब कुछ है। नासमझी की है रैली पुरज़ोर है आडम्बर, बह गए तो व्यर्थ ...