Wednesday, October 02, 2024

दिन

दिन 

बीत रहे हैं

गुज़र रहे हैं

फिसल रहे हैं

खिसक रहे हैं

लुढ़क रहे हैं

नहीं रुक रहे हैं।


हम

गिन रहे हैं

जोड़ रहे हैं

जोह रहे हैं

खो रहे हैं

आस

अब भी लगा रहे हैं।

लाज़मी है कि तुम मुझसे बिफरे रहो!

मैं ख़ुद ही नहीं वो जो मैं पहले था तो लाज़मी है कि तुम मुझसे बिफरे रहो! कभी था मस्त मौला न पीछे की सोच, न आगे का डर! थोड़ी अकड़, थोड़ा निष्फ...