Tuesday, August 18, 2026

अनुभव की गठरी

कैसे दूँ तुम्हें मैं

अपने अनुभव की गठरी ?

भरे हैं जिसमें मैंने-

मेरा गुरूर, मेरी जीत

मेरा गर्व, मेरी प्रेरणा 

मेरी ईर्ष्या,

मेरा भ्रम, मेरी ग्लानि 

मेरी ग़लतियाँ,

मेरी हार!


आधे पौने कर दूँ,

या छाँट दूँ जोड़े-चार में

नहीं तो लाद दूँ यह गठरी

एक ही बार में।

फिर लगता है कि 

ये सब तो मेरे भाव हैं,

मेरे परितोष, 

मेरे घाव हैं।

अनुभव की तो

यही है विडंबना 

खुद ही सबको बहना

जलना, डूबना और उबरना;

व्यर्थ है बस इनको सुनना!


न बाँटूँ 

तो ही बेहतर

मेरा क्षोभ, मेरा हर्ष

मेरा उल्लास, मेरा डर!

बूझो -

तो नहीं है इसमें तुम्हारी क्षति!

होती है आख़िर 

सबकी अपनी गति

अपनी ही मति! 

आपका फ़ोन आया है

सबसे पहला फ़ोन नंबर जो हमको याद है वो था - २१४०९। बहुत लोगों को बांटते फिरते थे और मज़ेदार बात ये है कि वो हमारा नंबर भी नहीं था। वो पड़ोस में तिवारी बाबा का फ़ोन था जिसे हम पर्सनल फोन की तरह ही इस्तेमाल करते थे।


बात उस समय की है जब टेलीफोन लाल फीताशाही की गिरफ़्त में था और कनेक्शन के लिए बहुत लंबी जद्दोजहद होती थी। दूरसंचार विभाग में जाकर नंबर लगाने के बाद अगर आप आम आदमी हैं तो कम से कम साल भर इंतज़ार करना होता था।


तो जब हम तिलकामाँझी में रहते थे तो पापा ने नंबर लगाना भी अनिवार्य नहीं समझा। पड़ोस में बहुत दूर दूर से रिश्तेदार लगने वाले और ज़्यादा नज़दीकी बैंक कनेक्शन के कारण हम उनको तिवारी बाबा कहते थे। ये बात अलग है कि ख़ासकर उनसे, शायद एकाध बार ही मुलाक़ात हुई हो और उस मुलाक़ात में भी उन्हें तो बाबा बोलने का मौक़ा भी नहीं मिला; हाँ मगर उनके घर का नाम तिवारी बाबा का घर बन गया और उनका फ़ोन हमारा।


घर बड़ा ही आलीशान था, बड़ा हाता, कुछ फूलों के पौधे और पेड़ों के बीच दो मंज़िला मकान जिसमें ऊपर वाले महले में तिवारी परिवार रहता था- तीन लड़कियां, दो लड़के और एक नाती के साथ। उनका नाती चंदन हमारा दोस्त था - दोस्त तो शायद वो भैया का था हम तो बस टंडेली करते हुए दोस्त बने हुए थे।


ऊपरी मंज़िल के चारों ओर एक रनिंग बालकनी थी और हमारे घर की तरफ उनका डाइनिंग हॉल भी पड़ता था। हमको ठीक-ठीक याद नहीं कि उस परिवार से घनिष्ठता कब बढ़ी लेकिन ये ज़रूर याद है कि नवासी के दंगे के समय मोहल्ले के कई परिवार को उन्होंने ही आश्रय दिया था। घनिष्ठता यूँ थी कि तिवारी बाबा की दोनों बेटियों (तीसरी की शादी हो गई थी और उन्हीं का बड़ा बेटा चंदन हमारा दोस्त था) को हमलोग दीदी बोलते थे - गुड्डी दीदी और रीना दीदी और उनके लड़कों को चाचा - उदय चच्चा और लल्लू चच्चा! और कुछ न कुछ आदान ज़्यादा और प्रदान कम हमारे बीच चलता ही रहता था। जैसे किसी आयुर्वेद के ज्ञानी ने हमारे घुटने और कोहनी के बैंगनकाँटे के लिए अड़हुल की कलि को पानी के साथ निगलने का नुस्ख़ा बताया था तो वो कलियाँ तिवारी बाबा के घर से ही आती थीं। लेकिन सबसे महत्वपूर्ण आदान तो उनके फ़ोन का ही था। 


“भाभी आपका फोन आया है, नाथनगर से”, अक्सर गुड्डी दीदी या उदय चाचा उस रनिंग बालकनी से आवाज़ लगाते थे। प्रोटोकॉल ये होता था कि फ़ोन करके पहले बता दीजिए कि फ़लाँ जगह से बोल रहे हैं और पाँच मिनट बाद फिर फ़ोन करेंगे, आप उनको बुला दीजिए। मज़ेदार बात यह थी कि उस वक़्त किसी को कोई संकोच या आपत्ति भी नहीं होती थी।


तिलकामाँझी से जब हम भीखनपुर आ गए तब तक वो ९१ वाला आर्थिक उदारीकरण काल आ चुका था। तो हमारे पास भी टेलीफ़ोन आ गया था - पहले कुछ साल मटमैला सेट और फिर लाल सेट वाला फ़ोन। जब नंबर मिला तो हमें लगा कैसे याद होगा ये छह अंक वाला नंबर, और जो याद हुआ तो आज तक याद है - ४२९४६७! उदारीकरण के बाद भी वैसे कुछ ख़ामियाँ रह ही गईं थीं जैसे उस फोन में एस टी डी कनेक्शन। उसकी ज़रूरत तब महसूस हुई जब पापा का तबादला राँची हो गया। अब उसके लिए एक दूसरा जुगाड़ हुआ- पापा के ही परिचित थे जिनके घर पर यह सुविधा थी पर उनका घर तिवारी बाबा के घर के जैसे पड़ोस में नहीं था। प्रोटोकॉल में अब पाँच की जगह पंद्रह मिनट का अंतराल रखा जाता था, जिस दरम्यान उनका एक नौकर घर पर आवाज़ लगाता था - “आपका फ़ोन आया है, राँची से”! पापा के वापस स्थानांतरण तक हमारे यहाँ भी एसटीडी कनेक्शन आ गया था, जिसका पूरा श्रेय हम देंगे श्रीमान अमिताभ बच्चन को। आख़िर कौन बनेगा करोड़पति शुरू हो चुका था और हमें फ़ोन लगाकर अपनी क़िस्मत भी तो टटोलनी थी।


अभी सोचने पर लगता है कि क्या बेहतरीन सोशल नेटवर्क था ये। मतलब फ़ोन रिसीव करने के बहाने गप शप और कुछ रिफ़्रेशमेंट भी हो ही जाता था और हर कॉल के साथ घनिष्ठता बढ़ती ही जाती थी। फिर तो हमारे फ़ोन पर भी पड़ोसियों के कॉल रिसीव होने लगे - उसी पाँच-दस मिनट वाले प्रोटोकॉल के तहत! हमारे बैंगलोर आते आते तो घर के छह अंकों का फ़ोन नंबर सात का हो गया - २४२९४६७, बस एक अंक का बदलाव। बड़ा बदलाव तब आया जब दस अंकों के मोबाइल नंबर्स आ गए, जिनको याद करना बड़ा ही कठिन था तो साथ में आ गए डिजिटल फ़ोन बुक, खुद फ़ोन पर ही। फिर आधार, पैन, पासवर्ड और न जाने क्या-क्या! इन अंकों के सैलाब में फँसा एक आम आदमी शायद बस अपना ही मोबाइल नंबर याद रख पाए। अब २१४०९ वाली न सरलता रही, और न ही ऑरिजिनल सोशल नेटवर्क और न वो प्रोटोकॉल- “आपका फ़ोन आया है”!

Monday, July 06, 2026

लाज़मी है कि तुम मुझसे बिफरे रहो!


मैं ख़ुद ही नहीं वो जो मैं पहले था
तो लाज़मी है कि तुम मुझसे बिफरे रहो!
कभी था मस्त मौला
न पीछे की सोच, न आगे का डर!
थोड़ी अकड़, थोड़ा निष्फिकर
काहे का संकोच, भरपूर जोश
अट्टहास से बिखराता क्षोभ!
अब तो ओढ़े कितनी चादरें 
डर, शक, शोक की परतें!
सफलता असफलता का बंधन
भूले बिसरे हार की धूल, जीत का चंदन
न बढ़ने देता है न टिकने!
तो कहॉं रहे हम अब पहले जैसे
और लाज़मी है कि तुम मुझसे बिफरे रहो!

Thursday, March 19, 2026

इतना आसान नहीं होता

इतना आसान नहीं होता

हवाओं से हल्के मन को

खुली फ़िज़ाओं में उड़ने देना!


कई गिरह खोलने पड़ते हैं

कई कड़ियाँ तोड़नी पड़ती हैं

और देखिए विडम्बना 

ना मन दिखता है

न ये गिरह, न कड़ियाँ।


ख़्यालों के धागों में

आप ही उलझते जाते हैं,

न कभी थी, न होगी

वैसी समस्याओं को

जाने क्यों सुलझाते हैं?


मन इन्हीं संकरी गलियों में

अवाक सा रह जाता है

बंद अंधी गलियों में

थक कर बैठ जाता है।


आग कहीं लगती है

धुआँ कहीं और उठता है

मन हमारा इन्हीं बोझ तले

दबता चला जाता है,

हवाओं से हलके मन पर

कितने मन का बोझ चढ़ जाता है।

अनुभव की गठरी

कैसे दूँ तुम्हें मैं अपने अनुभव की गठरी ? भरे हैं जिसमें मैंने- मेरा गुरूर, मेरी जीत मेरा गर्व, मेरी प्रेरणा  मेरी ईर्ष्या, मेरा भ्रम, मेरी ...