कैसे दूँ तुम्हें मैं
अपने अनुभव की गठरी ?
भरे हैं जिसमें मैंने-
मेरा गुरूर, मेरी जीत
मेरा गर्व, मेरी प्रेरणा
मेरी ईर्ष्या,
मेरा भ्रम, मेरी ग्लानि
मेरी ग़लतियाँ,
मेरी हार!
आधे पौने कर दूँ,
या छाँट दूँ जोड़े-चार में
नहीं तो लाद दूँ यह गठरी
एक ही बार में।
फिर लगता है कि
ये सब तो मेरे भाव हैं,
मेरे परितोष,
मेरे घाव हैं।
अनुभव की तो
यही है विडंबना
खुद ही सबको बहना
जलना, डूबना और उबरना;
व्यर्थ है बस इनको सुनना!
न बाँटूँ
तो ही बेहतर
मेरा क्षोभ, मेरा हर्ष
मेरा उल्लास, मेरा डर!
बूझो -
तो नहीं है इसमें तुम्हारी क्षति!
होती है आख़िर
सबकी अपनी गति
अपनी ही मति!
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