दिमाग़ के
सारे पोर बंद हैं
न स्वाद है
न सुगंध है
ये जुकाम बड़ी बेरहम है।
ऑंखों में खुमारी
टूटते बदन के
हर हिस्से में ख़म है
ये जुकाम बड़ी बेरहम है।
उठती सॉंसों में
विरक्ति,
उतरती में बलगम है
ये जुकाम बड़ी बेरहम है।
कैसे दूँ तुम्हें मैं अपने अनुभव की गठरी ? भरे हैं जिसमें मैंने- मेरा गुरूर, मेरी जीत मेरा गर्व, मेरी प्रेरणा मेरी ईर्ष्या, मेरा भ्रम, मेरी ...
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