Thursday, December 26, 2019

पीकू का झरोखा

सुबह का है नज़ारापीकू
देखो कितना प्यारा
वो बैग लटका कर
कैसे मुन्नी दौड़ लगाए
उधर घसीट कर पैरों को
मुन्ने की ईप्सा है कि
बस छूट जाए।

सेहत की आस में
देखो कोई द्रुत कदम बढ़ाए,
कोई सिर्फ कपड़ों की आड़ में
जैसे कपड़ों को ही टहलाए।

दिनचर्या की दौड़ भाग से दूर 
कोई चिंतन में खो जाए,
खिलखिलाती धूप की आस में
देखो कबूतरकुत्ते भी आए।

दुनिया का रंग पीकू
है देखो कितना अनोखा
तुम्हें देखना-सीखना
अभी है बहुत,
ये जो है तुमने देखा
बस है एक झलकएक झरोखा।

No comments:

Post a Comment

सब कुछ

हाड़ मांस का ये शरीर   प्राण जैसा कुछ तो है कहते हैं जिसको आत्मा  जान गए तो सब कुछ है। नासमझी की है रैली पुरज़ोर है आडम्बर, बह गए तो व्यर्थ ...