खुशबू निचोड़े भरे जामों की दुनिया, ये दुनिया...
कहकहे लगाते अश्लीलों की दुनिया
ढोंग मे लिप्त बेशर्मों की दुनिया,
रंग भरे फीके रूहों की दुनिया,
खोखले ख्यालों के वाचालों की दुनिया, ये दुनिया
दिखावटी, ओछे भंगियों की दुनिया
फायदों को जोडती, ओहदे टटोलती,
नेकी की कब्र खोदती ये दुनिया
ये दुनिया अगर मिल भी जाये तो क्या है !!!
Sahir, Piyush Mishra...my two cents
Sunday, March 27, 2011
दुनिया
Wednesday, February 16, 2011
रंगरेज
एक ग़ज़ब सा उबाल उठ आया है
टूनिसिया की गलियों से लेकर
मिस्र का तहरीर उबल आया है।
अल्गेरिया, येमेन सब हुए हैं शामिल,
रुकना लगता है अब मुश्किल...
ये क्रांति तो फिजा बदलने आया है।
हमारे वतन का मौसम देखिये,
सर्द माहौल यूँ छाया है,
लूट-खसोट की हवा है बहती -
घोटाला, भ्रष्टाचार गहन घिर आया है...
लेकिन यहाँ कैसे हो क्रांति,
कैसे आये वो उबाल,
जब विचार ही अपना अँधा है...
उबले पानी भी कैसे,
जब नील नहीं यहाँ -
कावेरी, गोदावरी, ब्रह्मपुत्र, यमुना...गंगा है।
Sunday, February 06, 2011
इतवार की दोपहरी
आसपडोस के बच्चों ने भी उसी वक्त खेलना आरम्भ किया,
बल्ले-गेंद के शोर मे,
जब क्रिकेट स्टेडियम का माहौल खड़ा किया,
उसी चिल्लम-चिल्ली मे, नींदिया हमारी हुई खफा,
उखड, बिगड़कर आखिर उसने भी पलकों का साथ छोड़ दिया।
इस पर भी हमने नहीं छोड़ी हिम्मत,
जोर से बंद कर आँखें, कानोंको भी बंद किया,
मनमोहक दृश्य याद करके,
निंदिया रानी का आह्वाहन किया...
हस रही थी कोने मे छुपकर,
मेरी हरकतों ने जैसे उसे झकझोर दिया -
अलसायी सी उठी वो किस्मत,
मेरी हारी सी हालत पर आखरी वार किया।
उसी के इशारे पर जैसे
हमारा फोन अनायास ही बज उठा,
लोन की दुहाई देती एक महिला के स्वर ने,
रहा-सहा कसर भी पूरा कर दिया।
हाय री किस्मत!! तू बड़ी सयानी ,
उठ-बैठकर, आखिरकार हमने भी स्वीकार किया।
Friday, February 04, 2011
गिलौरी का ज्ञान
जोश हमारा परवान चढ़ा -
सुपाड़ी, तम्बाकू का ज्ञान नहीं
मीठे का ही बस शौक रखते हैं,
पर शब्दों के जब बाण चढ़ें
तो अर्थ-शून्य शास्त्रार्थ का भी हुनर रखते हैं ।
फिर वाकयुद्ध के इस समर मे
खोखली श्रेष्ठता का बाण हमने ताना
कहा - ज्ञान जहाँ है ही नहीं
वहां बेतुक, बेख़ौफ़ बोलते निकल जायेंगे
बिन बाधा, अवरोध बिना
एकाकी राज बजाते बढ़ जायेंगे ।
इस वजनदार संवाद का हम
अभी आनंद भी न उठा पाए थे -
की भीमकाय उपहास भरे शब्दों से
हुआ हमारा काम तमाम ।
सच ही कहा था किसी संत फकीर ने -
गिलौरी खाया कर गुलफाम,
जुबां पर रखा करती है लगाम ।
Saturday, January 29, 2011
इख़्तियार
शब्द कुछ फंसे रह गए
कुछ बुनने मे हो गए बेकार ।
कंठ ने साथ न दिया या शब्द थे हैरान
बेखुद से, ठगे से रह गए,
भीढ़ हुई धुआं और दिमाग वीरान ।
यूँ ऐसे न प्रकट हुआ करो
हमारी नहीं तो धडकनों का ही ख्याल करो ;
तराशने का वक्त दो,
या गिनकर लम्हे भेज दो
खुशबू उनमे पीरो लूँगा,
कुछ नहीं तो लम्हे ही संजो लूँगा ।
Sunday, December 12, 2010
कसूर
ग्लानी क्यों थी फिर?
गोद में वो बिलखता भी तो न था,
मुँह फेर लिया बस,
ज़िम्मेदारी मेरी क्यूँ हो?
चेहरा बनावटी था -
हाँ बनावटी ही तो था,
आंसू सूखे होते तो
कोई चिन्ह तो होता ही ।
हमारा ही बोझ होगा,
नज़रें झुकी ही रह गयी,
कोशिश हमारी क्यों रहती,
उनके कर्म हैं, दोष हम क्यों लें?
Thursday, November 25, 2010
नुस्ख़ा
चवन्नी भर विश्वास,
सेर भर किस्मत,
छटांक भर मेहनत
जुड़ी-तुड़ी हिम्मत,
मुट्ठी भर हौसला ।
हलकी सी आशा,
स्वादानुसार बनावट
छिटपुट इमानदारी,
बहुधा ढोंग,
पाव भर चातुर्य,
बोरी भर योजना,
एक इत्मीनान भरा दिल,
बस तैयार हो गयी हमारी बेस्वाद ज़िन्दगी ।
Saturday, September 25, 2010
India Unbound : A book for every Indian

Saturday, September 11, 2010
अप्रमेय
स्वाद है
कुछ चीज़ें, पैमाने से परे हैं ।
सोच है -
किसी ने नापा नहीं
तौला नहीं
मूल नहीं पर अस्तित्व है,
अगाध नहीं, असंख्य नहीं
बस पैमाने से परे हैं ।
Dog-eared
Wednesday, August 11, 2010
The Bet
And you do not expect much action in such a queue, what with pot-bellied people and equally innocuous other-gender species, moving as set pieces in the queue. Such a sight, at least gives you a sample of how seriously we take our health or appearance for that matter.
"So you are not a South Indian?", this was a query directed at me in that dreary queue.Well the queue is not as lifeless as I had mentioned earlier. And to top it all it was a girl who was asking me this. I replied back, "No".
"Yes, we had guessed it anyways". OK, thank you very much that at least by looks I don't look a South Indian. Some North Indian egoism in play here. And "We"!!! Who the hell are "we" and why are "we" discussing about my ethnicity?
"I am from Bihar", yes I could not control my eagerness to know why are people discussing me.
"Oh", yes the usual shock...am used to this.
"We had a bet and I lost". "We" again!!!!
And betting on me. What the $%^&!!! Do I look some kinda @#$%^&?
"Oh on me!!!", it was a sincere shock, no iota of overacting (which people say that I often do).
"It was nothing....just that Aasha was sure that you are not a South Indian...You had put 9XM yesterday and we were just trying to guess, which region you belonged to!!"
What a stupid bet...channel surfing, a credential to determine one's ethnicity!!! To cut a long story short, we have a TV in our cafeteria and that is the only source of our entertainment during lunch. (If you don't count the meaningless manager jokes people crack). And an airtel set-top box connected which very few people dare to touch. The reason being we don't have a remote and all channel surfing has to be done manually. And this I came to know recently that people dread to walk up to the set-top box and change channels. Why - try changing channels in full public glare and you'll know.
Now since I don't care about what people say and reviews in general, I am you can say the entertainment man of my cafeteria.
And next day I see Aasha in the lift. Excerpts:
"You"
"Yes am not a South Indian"
"Then"
"From Bihar"
"Oh"
"Won the bet anyways!!"
"Great"
And a very experienced colleague of mine (you can never doubt his analysis of married status of ladies), seeing all this said "Wow man!!! Even married women are talking about you these days. And what was that bet all about?"
"What!!!! They are married!!!!"
"We" are married - All charm, all effort gone down the drain...as 9XM jingle says - "Ban gaya mein Bheegi billi"!!!
Tuesday, July 27, 2010
दर्पण
डूबे,
कहीं खोए हुए से ।
धुंधले,
संकीर्ण,
सुलझाते कोई उलझन ।
उल्लासित ,
झिलमिलाते,
जगे, खिले हुए ।
छुपाते,
सहमे हुए से
ढके हुए, खामोश ।
मन-दर्पण
आँखें ।
Saturday, May 29, 2010
रोज़ाना
यूँ कहें की धड़कनों की दूरी है
छू जाती हैं
पर हवाओं को भी रुख़ बदलना होता है
करीबी अवरोध बन गयी हैं
इतने पास होते तो हम उनके भी न थे
शिक़वे होकर भी न हो सकते हैं
रोज़ मिल ही जाते हैं
कभी कुछ पूछते नहीं एक दूसरे से
शायद नियति है
अब तो सगी सी लगती है...बैंगलोर ट्रैफिक !
Saturday, April 10, 2010
पुरानी जीन्स
लहराती हुई उस चाल में
बातों के उस ग़ुबार में
वो अजीब सी मासूमियत
क्या ग़ज़ब का टशन
सहमते, लजाते हुए उनसे दो बात
झुकती आँखों की शर्म
"तेरी भाभी है" का भ्रम
दो बातों को बनाकर चार -
किस्से आसमानी
असल में एक तरफ़ा प्यार।
बेख़ौफ़, बेपरवाह से
हर कदम में जीत
हर ठोकर में दुनिया
हर जिरह में ज़िद
हर बात पर शर्त।
"देख लेंगे" था अभेद हथियार
"रुख़ बदल देंगे" था अकथ विश्वास।
बातें पिछले जनम की ?
या यादें धुंधली हो चली हैं।
शायद फ़र्क़ इतना है -
तब उम्र बीस की थी
अब तीस की हो चली है।
Sunday, February 28, 2010
हम, हमारी बुलबुल और वो...
अब चूँकि आर्टिकल ३७७ को हमारे संविधान ने स्वीकृति दे दी है, इसलिए सारे भ्रम को दरकिनार कर हमने उनका नाम रखा "बुलबुल"। नामांकरण होना नहीं था की हमारी चाल में उछाल और आँखों में चमक आ गयी। और जब रस्ते पर लोग पलट पलट कर हमारी ही सवारी देखते थे - इस बात का तो हमें इल्म ही नहीं था की वो हमारी डील को देख हँसते थे और शिष्टता का प्रसार करते हुए बस आँखों से मुस्कुरा देते थे - तो हमारी तो जैसे बांछें खिल जाती थी।
पहले ही सप्ताह में एक ट्रैफिक सिग्नल पर हमसे एक महानुभाव ने पूछ लिया - "कितना पड़ा?" । हमने सीना चौड़ा करते हुए अपनी तर्जनी को उठा कर इशारा किया की १ लग गया। उनका चौंकना लाजमी था लेकिन फिर उनके अगले सवाल - "तेल कितना पीता है?" से हमारे तन बदन में आग लग गयी। मन तो हुआ की उनसे पूछें की साहब आप अपनी बीवी से ये पूछते हैं की वो कितना खाती है । लेकिन उनकी किस्मत अच्छी थी की सिग्नल हो गया और उनके दांपत्य जीवन की खिल्ली नहीं उड़ी।
फिर एक दिन हमारे एक दोस्त ने हमें दावत पर आमंत्रित किया (दोस्त क्या सुदूरवर्ती रिश्तेदार ही थे) । हम हमारी बुलबुल के साथ उनके यहाँ धमक गए। अब उनसे ये दृश्य शायद हज़म नहीं हुआ और उन्होंने वो सवाल पूछ लिया जिसको पूछने से दुनिया शर्माती थी - "संभाल लेते हो?"। झेंपते हुए हमने कहा हाँ हाँ बिलकुल। उनका अगला सवाल - "जिम ज्वाइन किया है क्या?"। हमारे तो जैसे सब्र का बाँध ही टूट जाता उस वक्त की महाशय हम इसे धक्का देकर नहीं चलाते, ये भी अन्य दो-पहियों की तरह इंजीन से ही चलता है। लेकिन फिर वही शिष्टता की बात आ गयी और बस किसी तरह बात को हमने रफा दफा कर दिया।
अब आये दिन ऐसी छोटी मोटी घटनाएं होती रहती हैं - जब कभी हमारा सीना चौड़ा हो जाता है और कभी हम शर्मसार होकर किसी तरह दिल को समझा लेते हैं। लेकिन प्यार मोहब्बत की जो पारस्परिक प्रथा है वो हमें अब जाकर समझ आयी है । इसमें कोई दो राय नहीं है की हमारी बुलबुल हम पर उतना ही जान छिड़कती है जितना हम उनपर!!!
Wednesday, December 09, 2009
शादी कब कर रहे हो?
कुछ दिनों तक तो हमने इस सवाल को टाला, लेकिन जब एक दिन में २ राहगीरों ने इस सवाल को दोहराया , (दूसरे ने पारिभाषिक रूप से तो सवाल नही किया, मगर कभी कभी निगाहें भी पता नही कितना कुछ कह जाती हैं - इसके लिए कभी दूसरा ब्लॉग) तो ऐसा लगा की ज़िन्दगी में कुछ अचूक सवाल होते हैं जिनका कोई अचूक जवाब नही होता । और जब आप यूँ तनहा वीकेंड में घर पर पडे रहते हैं, या कहीं कूप अंधियारे में भटक रहे होते हैं तो ऐसे ही सवाल आपके मन में खटकते हैं ।
एक वीकेंड हम भी ऐसी ही अवस्था में थे - तनहा , फुर्सत में, तस्सवुर-ए-जाना किए हुए । वैसे हमने अपनी ज़िन्दगी में बहुत रेयरली ही किसी चीज़ के लिए लोड लिया है। इसकी कई वजह दे तो सकता हूँ पर आपने अगर हमारी माशा अल्लाह डील देखी है तो आप ख़ुद समझ जायेंगे। मगर उस नवम्बर महीने के मनहूस वीकेंड ने हमारी डील को अनदेखा कर हमें लोड लेने पर मजबूर कर दिया। हुआ यूँ की हमारे तीन मित्रों ने शादी कर ली थी और वही किया था जिसके बारे में हमने पहले परिच्छेद में लिखा है। खुशी तो बहुत हुई हमें लेकिन उसके असली प्रभाव ने हमारे जेहन में धीरे धीरे रंग पकड़ा ।
पीयर प्रेशर का सही अर्थ, अगर सच कहें तो हमें इस दिन समझ आया । अब ऐसा हो गया है की हमारे मित्रों में पौने लोंगो ने तो शादी कर ली है। खुशी तो बहुत होती है की जिनके साथ निक्कर पहन कर भटका करते थे उन्हें अब उस स्वरुप में कोई और ही देखेगा :D
हाँ बस डर इस बात का है की कहीं उनका कॉल न आए और उनका पहला सवाल ये न हो - "शादी कब कर रहे हो?"
Tuesday, December 08, 2009
मेरा सिटी बैंक क्रेडिट कार्ड: जय हो !!!
सन २००९, इतिहास में ऐसे साल के नाम से जाना जाना चाहिए, जिसमे हमारे घूमने की योजनायें तो बहुधा बनी लेकिन कार्यान्वित एक भी नही हुई। अब हुआ यूँ की हमने अपने भाइयों और कुछ दोस्तों के साथ लदाख देखने की योजना बनाई थी । शुरुआती जोश कहिये या कुछ और हमने ताबड़ तोड़ तय्यारी कर ली। एक रे-बैन का नया चश्मा, कुछ नए कपड़े (गर्म कपड़े) और एक नया बैग। इससे हमारे क्रेडिट कार्ड का बिल थोड़ा सर से ऊपर निकल गया। आजकल के नौजवान कहाँ चादर की फिक्र करते हैं। अब जब पैर लंबे हो जायें तो चादर ही बदल लेते हैं, फ़िर जितना पैर पसारना है पसारें । और जब सिटी बैंक का प्लैटिनम कार्ड हो तो उधार की चादर अनंत से भी लम्बी लगती है ।
और हुआ वही जिसका अंदेशा भी नही था - हमारे हिन्दी सफर की योजना अंग्रेज़ी सफर बन गयी। किसी कारणवश हम लदाख न जा सके और अगले २ महीने तक हमने उस बिल का भुगतान किया। जी हाँ दुनिया की क्रेडिट क्राइसिस में जो भी थोड़ी बहुत राहत दिखी है वो हमसे ही है।
इस बीच हमारी कंपनी ने भी हमे आयरलैंड भेजने की योजना बनाई । हमसे कहा गया था की एक दिन की नोटिस पर सफर के लिए तैयार रहे। अब ऐसे नोटिस अगर बीवी दे तो आपके हाथ पैर बंध जाते हैं (ऐसा सुना है, क्यूंकि भगवन की कृपा से हम अभी भी कुंवारे हैं ) और आप भीगी बिल्ली बन मोहतरमा की आज्ञा का इंतज़ार करते हैं। लेकिन अब ऐसी नोटिस कंपनी की हो और वो भी विदेश जाने की तो कुछ बाहर जाने का जोश और कुछ तो शौपिंग करने का बहाना आपको अपने क्रेडिट कार्ड से दूर नही रख सकता । हमने फ़िर ताबड़ तोड़ खरीदारी की और एक क्या आधे दिन के नोटिस पर जाने के लिए तैयार हो गया। पर कहते हैं न की किस्मत में हो "@#$%" तो कैसे मिलेंगे पकौड़े। जी हाँ ये योजना भी हमें और हमारी कार्ड को धता बता कर हवा हो गयी ।
फ़िर एक योजना बनाई पांडिचेरी देखने की। इस बार हमने अपने दोस्त का क्रेडिट अकाउंट का इस्तेमाल किया। बस उधारी के पैसों में पूरा शहर देखा। लौटते वक्त जैसे हमारी उधार की ज़िन्दगी का भार ऊपर वाले को ज़रा हल्का लगा और उन्होंने हमारे वाहनको मटिया मेट कर दिया। बस एक दुर्घटना - अब छोटी कहें या बड़ी, ये यहाँ पर कहना उचित नही होगा - और हमारी क्रेडिट की दुनिया में १-२ सितारे और जुड़ गए।
अब जब इतना कुछ हो जाना था तो गोवा का प्लान क्यूँ पीछे रहे? नवम्बर का महिना आया नही की हमने बड़ा दिन गोवा में मनाने का प्लान बनाया। सारे दोस्त फ़िर से तैयार और हम तो उनसे २ कदम आगे ही। उड्डयन उद्योग भी हम जैसे बेवकूफों के लिए आँखें बिछाए बैठा रहता है। तो हम क्यूँ अपने को कम आंकने दें - झटके में रिटर्न टिकट बुक कर लिया और गोवा के मनमोहक बीच के सपने देखने लगा। लेकिन चूँकि सन २००९ में सफर बस ख्यालों में लिखा था इसलिए हमारा गोवा का प्लान भी बस वहीँ भष्म हो गया। और हुज़ूर जब योजना भष्म हो गयी तो साथ में कुछ चढ़ावा तो लगना ही था। जी हाँ हमारे क्रेडिट कार्ड का बिल एक बार फ़िर अमर जवान ज्योति में सुलगते हुए लौ की मानीन्द दहक उठा। आज आलम ये है की हम महीने की तनखाह को देखते हैं और कभी अपने क्रेडिट कार्ड के बिल को। और कसम है हमे उस कार्ड दिलाने वाले की जो कभी कार्ड को बंद करवाने का ख्याल जेहन में आया हो ।
Monday, November 30, 2009
Rise or fall?
Puffing up the dust
Better than them all!!!
Crushing the bones
cracking it with
lil more vigor
With a speed quicker than them all
Attacking n retorting
in equal measure
with equal sighs of gasp n awe
Can't remain the same
Flattered by one's own power
For better or worse...
Lion among the wolves??
Friday, October 09, 2009
क्या बदला??
बहाव में विचार भी जैसे घिस गए ।
उन पुराने पन्नों में ---
वो मोड़ फ़िर दिखे,
जहाँ कभी हम टूट गए,
जहाँ मूल्य भी सब छूट गए ।
उस चमकदार रौशनी में
शायद हम ही भटक गए।
उन मोड़ पर क्या बदला ?
शायद हम या
शायद हालात बदल गए।
Friday, September 18, 2009
दुनिया
जाल फैलाया,
फुसलाया-धमकाया,
लालच भी रखा साथ में,
हैफ की ना आया वो हाथ में!!
खेले सारे दांव पे दांव,
कई इक्के,
कितने गुलाम;
आँखें बिछाए,
घुटने टिकाये
गिरा रहा बस सामने
हैफ की न आया वो हाथ में!!
व्यग्र जब न रह सके,
मूल अर्थ समझ,
पृथक पड़े;
दक्ष बन -
भीगते ज्ञान की बरसात में,
हैफ की अब क्यूँ आया हाथ में!!!
इतना आसान नहीं होता
इतना आसान नहीं होता हवाओं से हल्के मन को खुली फ़िज़ाओं में उड़ने देना! कई गिरह खोलने पड़ते हैं कई कड़ियाँ तोड़नी पड़ती हैं और देखिए विडम्बना...
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Sholay is not a movie, its a way of life...at least my life ;) Watching Sholay on the big screen (that too in 3D) was a complete e...
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दूर दूर तक खेत दिखते हैं, ज़्यादा फ़रक भी नहीं है, कम से कम खेतों में। कभी हल्के रंग दिखते हैं और कहीं गहरे धानी। फ़सल गेहूँ सी लगती है पर क...