Sunday, June 13, 2021
Floccinaucinihilipilification
Tuesday, May 11, 2021
चश्म-ए-बद्दूर
Friday, April 30, 2021
Virtual Vaccine
कम्बख़्त इन्सानियत की जान लेने आया है
कहते हैं कि साथ में अगर बोल हँस लो
या हाथों में हाथ जो कस लो,
गले मिल लिया तो हो गई बड़ी गुनाह
मिल जाती फिर उसे एक नई पनाह।
वो ये भी कहते हैं
कि दुश्मन तो अनदेखा है
पर किसी जालसाज़ ने
ख़तरनाक दाँव फेंका है,
जो न हो तैयारी
तो गिरती है गाज भारी।
दुबके डरे सब बैठे हैं,
आलस से अकड़े ऐंठे हैं।
मूड भयंकर ऑफ है
जहाँ नहीं मातम वहाँ ख़ौफ़ है।
तो चलो अब कुछ ऐसा करते हैं
दुश्मन पर फबती कसते हैं,
इन्सानियत को नई अमृत देते हैं।
वर्चुअल चौपाल बनाते हैं
अड्डेबाज़ी को रुप रंग नए देते हैं
हँसी ठीठोली खूब करते हैं।
गले या हाथ नहीं
चलो दिलों को टच करते हैं।
मानव स्पर्श की भले हो कमी
दुश्मन शर्तिया खाएगा चकमा,
फाँकेगा धूल, चाटेगा ज़मीन ।
Monday, March 22, 2021
बिहार हूँ मैं
थूक का लहराता लार हूँ मैं
गंदगी शिरोमणि बिहार हूँ मैं
शोरगुल हो हल्ला की चीत्कार हूँ मैं
टऽच कर देखो यलगार हूँ मैं
गिरता पड़ता बीमार हूँ मैं
हर बात पर तनी तलवार हूँ मैं
सिंहों की दौड़ में रंगा सियार हूँ मैं
भूत पर इतराता बेकार हूँ मैं।
बदल न पाओ वो इख़्तियार हूँ मैं
तुम्हारे बोझे को ढोने तैयार हूँ मैं
हर इल्ज़ाम सहता गुनाहगार हूँ मैं,
मज़दूरों, रैयत का सिपाहसलार हूँ मैं
दबों कुचलों का सार हूँ मैं
मगही, भोजपुरी, अंगिका, मैथिली
जानें कितनो में बंटा तार तार हूँ मैं
जीतने की नहीं है जल्दी
फिलहाल तो हार हूँ मैं
हॉं तो कोनची बिहार हूँ मैं।
Wednesday, November 04, 2020
तिल का ताड़
हिन्दी में भी, अन्य भाषाओं की तरह, एक शब्द के कई अर्थ होते हैं। ऐसे अनेकार्थी शब्द अलंकारों में बहुत उपयोगी सिद्ध होते हैं, मसलन-
“कर का मनका डारि कै, मन का मनका फेर!”
अब कबीर के दोहे में तो जाने कितनी परतें होती हैं। हर दिन एक नया अर्थ ही मिल जाता है। और जिस तरह ज़िंदगी की गिरहें खुलती हैं उसी तरह इन दोहें की परतें। अनेकार्थ शब्द तो बस एक पहलू है कबीर के दोहों का।
ये तो हुई आध्यात्म की बात। फूहड़पन में भी ऐसे अनेकार्थी मिल ही जाते हैं। जैसे कि एक शब्द है - ताड़। इसके एक अर्थ की नुमाइंदगी तो हर गली नुक्कड़ पर रोडसाईड रोमियोज़ देते रहते हैं और दूसरा अर्थ भी सर्वज्ञ है, जैसे -
“बड़ा हुआ तो बढ़िया है, जैसे ताड़-खजूर,
चढ़ने में मज़ा आए, फल मिले भरपूर”।
उपरिलिखित दोहे का पूरा क्रेडिट जाता है बचपन के हमारे मित्र “झा ब्रदर्स” को! ये दोहा उनका बोर्ड परीक्षा के बाद मेरे लिए फ़ेयरवेल गिफ़्ट था।
तो इसी शब्द के दोनों अर्थों के साथ फूहड़पन की लपेट में एक बार हम भी आ गए। बात उन दिनों की है जब रुड़की विश्वविद्यालय के लिए अलग से फ़ॉर्म भरना होता था और उसको फिर रजिस्टर्ड पोस्ट से भेजना होता था। इसी काम को अंजाम देने, सुबह दस बजे हम नहा धोकर पहुँच गए बड़ी पोस्ट ऑफिस। पीक ऑवर रहा होगा, क्योंकि कांउटर पर कुछ दस-बारह लोग हमसे आगे खड़े थे और हमारे पहुँचते पहुँचते तीन चार हमारे पीछे। अब तो इतनी बड़ी लाइन लगती भी न हो, क्योंकि आजकल तो सब कुछ ऑनलाइन ही हो जाता है।
ऐसी लाइनों में अकसर वो साईड एंट्री वाले लोग प्रयासरत रहा करते थे। ‘वी आई पी’ बन नहीं पाए तो क्या हुआ, ऐसी टुच्ची लाइनों के लिए वो ख़ुद को ‘वी आई पी’ ही समझते थे - लाइन को नज़रअंदाज़ कर सबसे आगे पहुँच जाने वाले। तो अगर आप फैल कर नहीं खड़े हैं तो आपकी बुड़बकी है - आइए फिर लन्च के बाद!
बस इसी इंच को माईल नहीं बनने की जद्दोजहद में हम अपनी बारी का इंतज़ार कर रहे थे कि अचानक हमारे पीछे हो हल्ला मच गया। गहमागहमी में हमने देखा चार-पॉंच लोग एक फ़िरंगी महिला के साथ स्पीड पोस्ट वाले काउंटर की तरफ़ बढ़ रहे हैं। वो कम से कम छह फुट की तो ज़रूर रही होंगी और साड़ी के कारण और भी लम्बी लग रहीं थीं। स्पीड पोस्ट का रेट रजिस्टर्ड पोस्ट से कम ही होता हैऔर इसलिए भीड़ भी साधारणतः वहॉं ज़्यादा होती है। पर उनके वहॉं पहुँचते ही भीड़ लाल सागर की तरह पट गई और दोनो तटों पर कतारबद्ध जनता बिना पलक झपकाए टारगेट लॉक कर तैनात!
ये तो बिलकुल ही शहर की गरिमा पर सवालिया निशान था। विदेश से आई मेहमान को कम से कम ऐसे तो नहीं ताड़ो भाई!
वैसे कुछ देर में एक अलग ही रंग देखने को मिला इस वाक़ये का। लेकिन वहॉं पहुँचने से पहले ऐसे नमूनों का चरित्र चित्रण बहुत ज़रूरी है। ये लोग शायद राजकीय परंपरा अनुसार विदूषकों के वंशज रहे होंगे। और चूँकि भागलपुर ऐतिहासिक अंग प्रदेश के नाम से विख्यात है तो यहॉं विदूषकों की कमी नहीं है। इनकी काबिलियत ये है कि ये राह चलतों पर टिप्पणी कर आगे बढ़ जाते हैं । मतलब हमने अपना काम कर दिया आपको हँसी आई तो हँस लीजिए । ऐसे विदूषक बैंक काउंटरों पर, बिजली बिल वाली लाईनों में या पान दुकान पर अकसर दिख जाते थे। और अब ऑनलाइन युग में कमेन्ट कर डिलिट करने वाले ऐसी श्रेणी में आते हैं।
कुछ देर तक छटपटाने के बाद हमारे ठीक पीछे खड़े विदूषक से रहा नहीं गया और अपने अंदाज़ में उन्होंने एक ‘रिटोरिक’ दागा - “विदेशी हैं और देखिए साड़ी पहन ली हैं।” अब या तो ये सवाल पूरी लाइन से था या फिर वो बस अपनी मन की बात कह गए। इससे पहले कि वो अंग-रंग की कोई टिप्पणी करते हमने उनको करीबन टोकते हुए हामी भर दी।
“अलबत्त लम्बी है लेकिन, ताड़ गाछ एकदम!”, वो नहीं रुकने वाले थे।
मुस्कान देकर हमने फिर हामी भरी।
अब जब माहौल जम गया तो उन्होंने हमको और हमारे कद को लपेटे में लेकर पंच लाइन दागा -
“एगो आप ही भागलपुर का इज़्ज़त बचाए हुए हैं यहॉं!”
आगे के दस-बारह, पीछे के चार-पॉंच और लाल सागर की तट पर वाली जनता, सबने एक बार तुलनात्मक दृष्टि हम पर डाली और सहमति में सर हिलाया। बस वो लोग एक विजयी चीख मारते मारते रह गए या कम से कम हमें तो ऐसा ही लगा। पर पूरे भागलपुर की इज़्ज़त- ये थोड़ा ज़्यादा हो गया! कुछ इतनी सारी नजरों का हमारी तरफ मुड़ना और कुछ ऐसी ज़िम्मेदारी का एहसास, हम बस चेहरा लाल किए अवाक् से खड़े रह गए।
Thursday, September 10, 2020
भेल पूरी वाला
शिक्षा के उद्यान में
सरल से परिधान में
ठेले पर भर चटकीले पकवान
स्वाद बॉंटने आता था
अरे नहीं,
वो तो प्यार बॉंटने आता था
मिला मिला कर पूरी भेल
थोड़ी मूरी, खूब कड़वा तेल
थोड़ी चटनी, पापड़ी थोड़ी
ज़्यादा के लिए फिर जी हुजूरी
हमें ज़िंदगी के रस दिखाने आता था
अरे नहीं,
वो तो प्यार बॉंटने आता था!
पापड़ी पर जम कर दही का तड़का,
उसके उपर जीरा का छौंका
मिर्च लाल, इमली खट्टी
हरी हरी धनिया की पत्ती
जीभ पर रंग लगाने आता था
अरे नहीं,
वो तो प्यार बॉंटने आता था!
Tuesday, September 08, 2020
मेरा नया बचपन
कभी-कभी उन यादों में
मन भटक-भटक सा जाता है
जब दिन सुनहरे होते थे,
शामों में ख़ुशबू तैरती थी
रातों में गीतों और सुरों की
निश्छल चॉंदनी छलकती थी।
बचपन के उन अनमोल पलों में
जब मन भेद नहीं जानता था,
उत्साह, जोश के धवल रंगों में
दिशाहीन, दौड़ता फिरता था।
एकविध इस जीवन में
बचपन फिर मिल ही जाता है।
किलकारी किल्लौल में जैसे
दिल रम सा जाता है।
मन बोझिल जब भी होता है
और बिटिया दौड़
गले लग जाती है;
मन को शीतल,
चित्त को प्रफुल्लित कर जाती है।
पेट, छाती और तन पर
कूद, कुलाँचे मारती है,
अपने नन्हीं बोझरहित काया से
हर बोझ हवा कर जाती है।
दिन फिर सुनहरे हो जाते हैं,
शामों में ख़ुशबू भर जाती है
रातों में नवल गीतों और
सुरों की अल्हड़ चॉंदनी,
खूब छलकती जाती है।
इन खुशियों के पल का फिर
नया ही मोल मिल जाता है!
Tuesday, August 11, 2020
चित्त रोगी
यशोधरा के बारे में बहुत सुना है। कभी पढ़ नहीं पाया हूँ । एक बार किसी जानकार ने “सखि वो मुझसे कहकर जाते” की भी चर्चा की। गुप्त जी के लिए सम्मान चौगुना हो गया । ज़माने की बात होती है, या यूँ कहें कि जुग की - औरत के परिप्रेक्ष्य से, उसके नज़रिए से ऐसे युगपरिवर्तक का किस्सा सुनाना।
मैथिली शरण गुप्त की काव्य रचनाएँ ऐसे ही नए परिप्रेक्ष्य के कारण साहित्यिक स्तंभ माने जाते हैं।वैसे जुग और युग शब्दों में भी कितनी भिन्नता है; सारे रुढ़िवादी, पीछे खिंचने वाले विचार, जुग में विश्वास करते हैं; सारे प्रगतिवादी, आधुनिकतावादी, युग में। हॉं, बात वो एक समय की ही करते हैं - अर्थ एक पर सार पृथक!
आज परसाई जी को पढ़ते पढ़ते एक बार फिर उस महाकाव्य की झलक भर मिली। अब मैथिली शरण गुप्त की ऐसी रचना कोई एक दिन में तो पढ़ नहीं सकते, तो मन बनाया कि किसी छुट्टी के दिन यशोधरा का श्रीगणेश करेंगे। और किताब से पढ़ेंगे, ये सॉफ़्ट कॉपी में हमारा कभी जी नहीं लगा। आप सॉफ़्ट कापी में ‘पी डी एफ’ पढ़ सकते हैं, पर महाकाव्य के लिए हाथों और दिमाग़ पर बराबर का वजन होना चाहिए। सिर्फ़ पढ़ना हमारा मक़सद नहीं, हमारी भी कोशिश है कि ये सूरत बदलनी चाहिए।
तो हमारी अपनी दुकान अमेज़ॉन पर सर्च किया और किताब मिल भी गई। बस अब छुट्टी का इंतज़ार है, जो कि कोरोना काल में तो मुश्किल ही लग रहा है। वैसे महाकाव्यों को पढ़ने के लिए किसी पहाड़ी छुट्टी की दरकार होनी चाहिए। क्यों? अब आप ही सोचिए कि समंदर किनारे, लहरों की आवा-जाही तो खुद एक काव्य रचना है, फिर वहॉं कहॉं महाकाव्य।
अब फिर से सोचिए हल्की मंद हवा, थोड़ी शीत समेटे आपको ठिठुरा जाती है। आप अपनी चादर को थोड़ा और जकड़ कर बॉंध लेते हैंऔर कॉफी के लिए हाथ बढ़ाते हैं। बाल्कनी के दूसरी तरफ आप ही की तरह, खुद को धुंध में जकड़े एक हरी भरी पहाड़ी आपको ताक रही है। ऐसे परिवेश के लिए ही महाकाव्य लिखे जाते हैं। सुनहले धुँधलके के बीच गोते खाता हुआ दिन, सुस्त गति से गुजरता हुआ; रातों में झिंगुर और यदा कदा बहती हवा की मद्धम आवाज़। ऐसी पृष्ठभूमि पर आप महाकाव्य को अपनी परिकल्पना से चित्रित कर रहे हैं।
ना! ‘बीच’ पर ऐसा कहॉं हो सकता है।
और फिर कथानक के आविर्भाव के लिए ऐसी विचारोत्तेजक रचनाएँ उतनी ही आवश्यक हैं जितनी अच्छी फसल के लिए उर्वरक। विचारों का उमड़ना उस उल्टी की तरह होती है जो खाद्य पर नहीं आपकी पाचन शक्ति पर निर्भर करती है। पाचन अच्छी तो आप ऐसी रचनाओं को रगों में दौड़ते पाएँगे। लेकिन कहीं कोई शब्द या भाव ने किरकिरी की तो रचनाकार कुछ अपाच्य, कुछ ख़ुद के पाचक रसों को उलट देता है। एक कृति में पूरी तरह से चित्त शांत नहीं हुआ तो और भी उल्टी निकलती ही रहती है। और महाकाव्य रचने के लिए तो आपको पित्त रोगी ही बनना पड़ेगा। यशोधरा सदृश रचनाओं को पढ़ने तक के लिए भी, आपको पहले जमीन पाटना पड़ेगा। तो रचनाकारों आपके लिए है ये आवाहन:
पहाड़ों पर जाएं, ज़मीन पाटें, उर्वरक डालें और चित्त/पित्त रोगी बनकर उल्टी करते हुए वापस लौटें।
Friday, August 07, 2020
जीवनदायिनी
Thursday, August 06, 2020
अब वो रुठना सीख रही है
न हो मन की,
या उसकी लय धुन में
रोक टोक हो
किसी परिजन की;
चेहरा तमतमाए
कभी एक कोने में
सिमटकर,
कभी दूर भाग कर सबसे
झुंझलाते चीखते,
चीजों को फेंकना सीख रही है
Wednesday, August 05, 2020
उसने मुझे निरस्त्र देखा है
मानसिक द्वंद्व में
विचारों से ओत प्रोत
उसने मेरे पेशानी पर
बल पड़ते देखा है,
उसने मुझे निरस्त्र देखा है।
ढोंग, दिखावे में लिप्त
उसने मेरे मन का खोखलापन
उसकी बेलगाम दौड़,
बेवजह उसका फिसलकर
गिरना देखा है।
आडंबर वाला
ढकोसला अहं,
विश्वासहीन
बाणों की तूणीर
और तैश में
फुदकना देखा है,
उसने मुझे निरस्त्र देखा है।
Wednesday, July 22, 2020
सुगम राह
बिहार के मिडिल क्लास परिवारों में पढ़ाई पर हमेशा से बहुत ज़ोर दिया जाता रहा है। फलाँ का लडका नेशनल टॉपर था; फलॉं के लड़के ने आई आई टी में रैंक पाया। दिन भर आपको ऐसी ही होनहारों के किस्से सुनने को मिलते हैं। अब ज़ोर पढ़ाई पर होती है या रिज़ल्ट पर ये विवादास्पद है।
हमारा वक़्त कुछ वैसा ही था, लालू राज में राज्य से बाहर नहीं निकल पाए तो सुनहरे अक्षरों में आपके ललाट पर लूज़र अंकित हो जाता था। फिर बिहार में बहार, नितिशे कुमार आए; बदला कुछ नहीं, हॉं नॉनिहालों को उनकी हर असफलता, जीवन-मृत्यु सदृश संघर्ष, बताई जाने लगी।
Wednesday, July 08, 2020
टेढ़ी नाक
मुनीम बनाम साबू
उस दिन सुबह से ही ‘मुनीम’ को देखकर मन चिड़चिड़ाया हुआ था। वो हरकतें भी वैसी ही करता था। जैसे एल ओ सी पर अक्सर होता है कि थोड़ा सा हो हल्ला मचा कर, आगे पीछे करके पाकिस्तानी भाग जाते हैं, ठीक वैसे ही। और कुछ दिन पहले ही हमारी जिरह हुई थी जो छोटी मोटी तो थी नहीं। सब मिल-जुलकर हमारे पारे को क्वथनांक की ओर धकेल रहे थे।
Monday, July 06, 2020
One third of a Halley’s connection
Saturday, June 20, 2020
Friday, June 05, 2020
नानीघर
सब कुछ
हाड़ मांस का ये शरीर प्राण जैसा कुछ तो है कहते हैं जिसको आत्मा जान गए तो सब कुछ है। नासमझी की है रैली पुरज़ोर है आडम्बर, बह गए तो व्यर्थ ...
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Sholay is not a movie, its a way of life...at least my life ;) Watching Sholay on the big screen (that too in 3D) was a complete e...
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“Even we had a training and test before we joined and this test thing that they have started has made it a very serious affair” , Aman said...
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यूँ ही कब कहाँ ये जीत पाती हर मोड़ पर सकुचाती हर चोट पर मुरझाती एक नज़र पडे तो इतराती अनजान कभी इसे है भाता एक रंग ही कभी रम जाता कभी ...