Thursday, March 12, 2020

छल

घ्राण पर तुम मत देना ध्यान,
कुछ भी सूंघ बहक जाएगा
भूत भविष्य में भटकाएगा;
ताक पर रख देगा वर्तमान ।

नैनों की भी मत सुनना तान,
प्रत्यक्ष तो समझ जाएगा
परोक्ष अनदेखा कर जाएगा;
करता रहेगा तुम्हें परेशान।

नैनों का ये पुराना काम,
कोई मीत जो छूट जाएगा
ये कल-कल अश्रु बहाएगा;
असम्भव इसको देना आराम।

इन्द्रियों में सबसे छलिया कान,
जो न सुनना वो भी सुन जाएगा
राई का पहाड़ बनवाएगा;
सुगम रस्ते भी 
नहीं रहने देगा आसान।

स्वाद से मिलेगा तुम्हें बड़ा कड़वा ज्ञान,
लत नए लगवाएगा,
बादशाह से फ़क़ीर बना जाएगा;
छूटेगा नहीं, चाहे छूटे प्राण!

मन के चौकीदार हैं ये
तैनात लिए तीर कमान,
एक बहलाएगा, 
दूसरा फुसलाएगा
बुद्धि पर पट डाल
प्रपंच से करेंगे हैरान।
अडिग, स्थिर मन से
लेना इनसे काम
कितना भी विचलित करें
धैर्य ही बस इनका समाधान।

Monday, March 09, 2020

मार्ग पट

ख़ुद टूटा बिखरा हूँ,
कैसे तुम्हें सहेजूँगा ।
हार का स्वाद जीव्हा पर मेरे,
जीत कैसे तुम्हें चखाऊँगा ।
हाथ संकोच ने है जकड़े मेरे,
परों को कैसे उड़ान दे पाऊँगा ।
ज़बान पर सोच का है बोझ पड़ा,
तुम्हें बेबाक कैसे बनाऊँगा!

हॉं ये है मेरे अनुभव का लेखा
ऊँच नीच जो भी मैंने देखा
तौल नापकर तुम्हें है आंकना
राह प्रशस्त आप तुम्हें है करना।

Friday, March 06, 2020

अब वो बोलना सीख रही है!

होंठ, जीव्हा, तालु में
हवा भर, उन्हें स्वर दे रही है
अब वो बोलना सीख रही है।
गौर से कभी सुनकर,
कभी यूँ ही अक्षरों को जोड़ तोड़ कर,
शब्दावली का विस्तार कर रही है
अब वो बोलना सीख रही है!
व्यक्त करने के नए माध्यम का
अवलोकन खूब कर रही है
अब वो बोलना सीख रही है!

Tuesday, December 31, 2019

स्वाद

ज़िन्दगी में स्वाद या यूँ कहें कि ज़िन्दगी का स्वाद ३५ के बाद ही आता है। उससे पहले करेले को चाशनी में भी क्यों न डूबो कर खाएँ, रहती है वो दुनिया की सबसे कड़वी चीज ही। मिर्ची (हरी हो या लाल) का तीखापन आँखों में आँसू के बांध और यदा कदा शिष्टाचार की हदें भी तोड़ जाता था। और फिर नमक तेल रोटी तो हम जैसे ज़मींदार के नाती कैसे खा सकते थे।

वैसे तो ३५ के बाद भी कड़वाहट, तीखापन या अकड़, कम नहीं होती पर ज़िन्दगी की एक परत ज़बान पर चढ़ जाने पर स्वाद के नए आयाम मिलते हैं।हॉं, यौवनावस्था में भी जब घर छूट जाता है तो घर के खाने का स्वाद समझ आता है।आप कॉलेज की छुट्टी में घर आकर कुछ भी खा लेते हैं और अपनी माँ को रुंधा गला और नम ऑंखें दे जाते हैं।लेकिन ये भी शायद आप स्वाद के लिए नहीं वरन् घर छूट जाने के बाद बाज़ारू भोजन की लत छुड़ाने के लिए करते हैं। फिर इसी दौरान आपको शायद सबसे पहली बार ज्ञात होता है कि आपके शरीर का सबसे मुख्य अंग होता है आपकी जीव्हा! 

और जीव्हा की कहानियॉं भी उतनी ही विरल होती हैं - जैसे दो अनजान व्यक्ति कभी-कभी स्वाद को लेकर आत्मीय संबंध जोड़ लेते हैं, मसलन ये सुनिए:

पहला: कहाँ से हैं आप?
दूसरा: बनारस से।
पहला: ओह! क्या बात है! वो कचौड़ी गली में मिश्रा जी का खुरचन अभी भी मिलता है क्या?
दूसरा: हाँ हाँ! अभी क्या, कभी भी जाइए मिलता है! 
पहला: बहत्तर में सबसे पहले गये थे वहाँ! अकस्मात ही मिल गई थी उनकी दुकान! नैनी से डेली पैसेंजर जब थे तब ख़ूब मज़े लिए हैं मिश्रा जी के खुरचन का! अब कहाँ वो स्वाद!
दूसरा: नहीं नहीं स्वाद तो अभी भी वही है बस भाव सोने का हो गया है। कभी बनारस आइए तो बताइए, हमें तो मिश्रा जी के यहाँ जाने का बहाना चाहिए।

हम भी अब कुछ सालों से पैंतीस के ऊपर हैं और जीव्हा के साथ साथ एकाध स्वाद से पहचानी वाली जगहों पर जिरह करने के काबिल हैं। हमारी कर्मभूमि में जालाहल्ली के बंगाली मिष्ठान भंडार से लेकर गांधीबाज़ार की स्वादिष्ट गलियाँ हों या संजय ढाबा का चिलीचिकन, हम ‘जी पी एस’ लोकेशन और स्वाद दोनों की जानकारी रखते हैं। और जन्मभूमि तो हमारी वैसे ही स्वाद के कम से कम दो आइटम के लिए जीयो-टैग्ड है - कतरनी चावल और जर्दालु आम। उस पर जिरह हो या दो-दो हाथ हम सदा तैयार हैं।

अब मसूदन के बालूशाही को ही ले लीजिए - भागलपुर में तो खूब तूती बोलती है इनके मिष्ठानों की। पर हमें हमारी नानी सास से पता चला कि जब वो भागलपुर आईं थीं तो उस दुकान की कायल हो गई थीं।तो बात लोकल नहीं रही है लगता है। बचपन में चखा तो ज़रूर था मसूदन के मिष्ठानों को और चूँकि हमारा ननीहाल बिल्कुल पास में था तो हर पर्व त्यौहार, छट्टी, जनेऊ, शादी सबमें वहीं का मिष्ठान खाया था। पर बात वही कि पैंतीस के बाद हमने उधर का रुख़ नहीं किया था।

इस बार घर गए तो सबसे पहले प्लान बनाया मसूदन के मिष्ठान भंडार का। मसूदन अपभ्रंश है मधुसूदन का ये तो हम समझ गए थे लेकिन वहाँ पहुँच कर पता चला कि उनको गुज़रे कम से कम बीस साल हो गए हैं। और यही नहीं उनके पौत्रों ने दुकान का बँटवारा कर लिया है। अब समस्या विषम हो गई कि आख़िर किस पौत्र ने अपने दादाजी के गुणों का अनुसरण किया है। ख़ैर मन ही मन मसूदन की आत्मा का ध्यान करते हुए (उनकी शक्ल तो वैसे भी हमने नहीं देखी थी) हमने एक दुकान से ही बालूशाही और घेभर दोनों उठाया।और जीव्हा पर रखते ही जैसे तीस साल पहले पहुँच गए। शनैः-शनैः जैसे घेभर मुँह में घुलता जा रहा था ये बात भी स्पष्ट हो रही थी कि लोग स्वाद को लेकर इतने भावुक क्यों हो जाते हैं।

हमने जब से जीव्हा की महत्ता समझी है तब से हर पकवान को स्वाद लेकर खाना सीख रहे हैं - फिर वो चाहे बासुकी नाथ का कचरी मुड़्ही हो; हरी मिर्च के साथ, चाहे पन्तुआ हो, खीर कदम हो या खीर मोहन। हम हमारी जीव्हा को सारे स्वाद फिर से याद दिला देना चाहते है। फिर क्या पता किसकी काली ज़बान चल जाए और परहेज़ में बाक़ी ज़िंदगी निकालनी पड़े। और हाँ आजकल उसी जीव्हा का मनपसंद खाना है नमक तेल रोटी और उसके उपर पकाया हुआ लाल मिर्च, अक्षुण्ण ज़मींदारी अकड़ के साथ।

Thursday, December 26, 2019

पीकू का झरोखा

सुबह का है नज़ारा, पीकू
देखो कितना प्यारा
वो बैग लटका कर
कैसे मुन्नी दौड़ लगाए
उधर घसीट कर पैरों को
मुन्ने की ईप्सा है कि
बस छूट जाए।

सेहत की आस में
देखो कोई द्रुत कदम बढ़ाए,
कोई सिर्फ कपड़ों की आड़ में
जैसे कपड़ों को ही टहलाए।

दिनचर्या की दौड़ भाग से दूर 
कोई चिंतन में खो जाए,
खिलखिलाती धूप की आस में
देखो कबूतर, कुत्ते भी आए।

दुनिया का रंग पीकू
है देखो कितना अनोखा
तुम्हें देखना-सीखना
अभी है बहुत,
ये जो है तुमने देखा
बस है एक झलक, एक झरोखा।

Monday, December 16, 2019

Flemingo

Fleming’s left hand rule (FLHR), with that strange concoction of the three fingers of your - what else - left hand, was how we were introduced to one of the advanced concepts of physics. For some it was just a gesticulation, with middle finger, the prominent one, ridiculing their yet to develop nascent brain. To add to the misery of those brains, there was a right hand rule too!

For me it was fun and a kind of ego massager - where some of the brilliant minds of my class failed to understand, I could effortlessly twist my fingers to show which way would the motion be, as predicted by the thumb! 

Now electromagnetism isn’t a simple phenomenon, especially if you have to imagine a multi-dimensional wave, one being orthogonal to the other. Fleming’s hand rules didn’t even involve the twist-your-brain-into-knots mathematics, which I later found out was for evolved brains. Nevertheless, these evolved brains failed to comprehend the hand rules - probably the only reason I can think of is they detested the idea that a concept with physics and mathematics, entwined, involved gestures from Kathakali!

This story goes back a few decades when I was a young student of X ‘B’. Tansen and I were thick as thieves then, with Naresh completing the triumvirate. Tansen was a natural all-rounder. His Mark Waughish cover drives were as famous as his effortless solutions to really complicated problems (academics or otherwise) or his charming smile. He also turned out to be the lyrical bahati-hawa-sa Phunsukh Wangdu character (immortalised by Amir Khan from ‘3 idiots’), when my friends and I too, lost track of where Tansen was after being last sighted at Infy, Bangalore for a brief period of time. He has suddenly reappeared after quite a long hiatus, thanks to WhatsApp.

The three musketeers (we didn’t have a name then) would meet infrequently at each other’s homes in the evenings and more frequently, if there was an impending exam. It was in one of these group study sessions, while discussing FLHR, I had a feeling of, what psychologists have termed, Superiority Complex. This was because my other two very talented friends had some trouble understanding FLHR, while I was giggling and solving problems with ease. The evening remains one of my cherished memories for it was on very rare occasions that I had an upper hand, with these guys in tow.

Just a few years down the line, however, there was a role reversal. We had graduated from being adolescents to young adults, by clearing what everyone called the-most-important-exam of our life and had got admission in XIth standard of the same school. Some of the dynamics changed - girls joined us (we were an all boys’ school till Xth standard) and all of a sudden, Maths and Physics achieved gargantuan proportions, which as described earlier was only for evolved minds. Add a heady mix of hormonal surge and what you have is a life in dizzy, where everything seemed to be travelling at breakneck speed. There was so much distraction that you had to constantly struggle to stay afloat, while the evolved ones were racing ahead!

Concepts of Physics by HC Verma, is a book revered by many - it is a concise book, explains the concepts (true to its name) in a no-nonsense cryptic text and then quickly moves on to some really good problems on the just explained concepts. These problems don’t have a solution manual and only IE Irodov surpasses the quality of problems in that book. 

I am not sure if Tansen had that feeling of Superiority Complex on that role-reversal day. However, it was a realisation for me that he is one of those evolved ones, who at that time was just enjoying his swim and soon will be among the winners! The problem that we were discussing was from the conservation of energy chapter - where a man is falling from a building with a suitcase in his hand and to avoid the terra-firma, should throw his suitcase at a certain speed horizontally. I wonder how people come up with such problems where you get rid of your worldly possessions, viz., suitcase, to save your life! Only trick here was you had to consider conservation of momentum in horizontal reference frame, with transformation of energy and the corresponding projectile motion which would help the man to fall into the swimming pool. Yes, even I didn’t get that and yes I still haven’t got that, while Tansen effortlessly solved it, matching the solution to the last decimal point!




They say it takes just a needle tip to deflate a baloon, this holds true for ego too. This HC Verma problem was that needle tip for me. My ego wasn’t just deflated but it was shattered to pieces. This was the epiphany that people wait for their whole lives. An inflection point in your life after which you ought to take a different path - be it your career or life decisions. Me? I didn’t change a thing and continued toiling to get admitted to an engineering college. The outcome is an engineer who knows that he is not as efficient problem solver as a Tansen, for instance. But then that is how life is and all we need is some lemons!

ठाकुरजी

ठाकुरजी हमारे कुनबे के एक तरह से कॉनसिलियरी हुए। अगर आपने गॉडफ़ादर पढ़ी या देखी है तो आप समझ ही गए होंगे और अगर नहीं तो सुनिए। हमारे पिताजी अगर गॉडफ़ादर हुए तो ठाकुरजी यथाशक्ति उनके हुक्म की तामील करने वाले हुए और यदा कदा अपना ज्ञान बांचने वाले भी। कद होगी उनकी कुछ साढ़े चार फीट, रंग सॉंवला, मितभाषी और हमेशा फॉर्मल्स में। वो कहते हैं न - ही मीन्स बिज़नेस। 
उनकी पहली बहाली वैसे ड्राइवर के रुप में हुई थी। पर धीरे धीरे उनकी कार्यकुशलता और प्रचुर मात्रा में जी हुजूरी उन्हें वहाँ से उठाकर हमारे “ओसरा” तक ले आई थी। बड़े कार्यों को सिद्ध करने के लिए उनका आवाहन किया जाता था। जैसे गैस लीक का अंदेशा हो, ताला तोड़ना हो, प्लंबिंग का काम या समरसेबुल की जानकारी। ठाकुरजी इन कार्यों में पारंगत तो नहीं थे पर जैक ऑफ ऑल होने के कारण कुछ न कुछ जुगाड़ कर ही लेते थे।
अच्छा आप समरसेबुल में ही अटके रह गए क्या - वही बोरिंग जो जल स्तर नीचे होने के कारण आजकल हर घर में लगाया जा रहा है।गुगल मत करिए, ये लोकल लिंगो है नहीं मिलेगा; लोकल लिंगो में ही - गुगल फेल है। अच्छा चलिये अपनी तृष्णा का निवारण कर लीजिए और सब-मर्सिबल गुगल कर लीजिए। 
हॉं तो ये सारा ज्ञान भी ठाकुरजी या तो रखते थे या ऑउटसोर्स करवाते थे।
एक बार दोस्त की शादी में दरभंगा जाना था और हम बैंगलोर से ये मन बना कर चले थे कि घर से अकेले ऑल्टो में जाएँगे। रोड ट्रिप भी हो जाएगा और चूँकि उस वक्त सुशासन बाबू के बारे में बहुत सुन रहे थे तो एक झलक देख भी लेंगे। हाल ही में गाड़ी चलाना सीखे थे(ठाकुरजी से ही) तो जोश चरम पर था। घर पहुँचकर योजना में थोड़ी फेर बदल हो गई और ठाकुरजी को हमारे साथ लगा दिया गया कि कम से कम एक आदमी साथ में रहेगा।
अब ठाकुरजी हुए नंगे पॉंव ड्राइव करने वाले, योजनाबद्ध चालक जो चाय के लिए भी वहीं रूकेंगे जहॉं का मन उन्होंने सफर से पहले बना लिया है। ख़ैर सवारी निकली, तय हुआ था कि विक्रमशिला पुल को पार कर नौगच्छिया होते हुए दरभंगा पहुँच जाएंगे। अब संयोग कहिए या ठाकुरजी का “जतरा” कहिए, विक्रमशिला सेतू पिछले चौबीस घंटे से बन्द था। कारण था एक ट्रक जो पुल के बीचों बीच बन्द पड़ गया था, तो इधर वाले इधर और उधर वाले उधर ही फंसे पड़े थे।
हमने गाड़ी वापस मोड़ी और चल पड़े मुंगेर की तरफ कि मोकामा-समस्तीपुर वाले पुल से होकर दरभंगा पहुंच जाएंगे। 

गुगल मैप्स उस वक्त नवजात था तो वो भी नहीं बता पाया कि उस पुल की मरम्मत चल रही है; पहुँचे तो ये बात पता चली। पर अब जाना तो था ही तो हमने मन बनाया कि गॉंधी सेतू से हाजीपुर, मुज़फ़्फ़रपुर होते हुए गंतव्य पहुँचेंगे। इतना सुनना था कि ठाकुरजी का सब्र का बांध टूट गया और उन्होंने दागा अपना डॉयलॉग - “धौ! ओझरा दिए आप!”। अब अक्षरशः इसका अर्थ है कि आपने उलझा दिया पर इसके पीछे जो जीवन दर्शन है वो ठाकुरजी के बहुत सालों के अनुभव का निचोड़ है। कई दिनों के मंथन के बात हमें पता चला कि ठाकुरजी ने हमें लक्ष्य, ध्येय, प्राप्ति मार्ग के बनिस्बत गंतव्य की महत्ता - सबका सार उन चार शब्दों में बता दिया था।
उसके बाद उस पूरे सफर में बहुधा वो मौनी बाबा ही बने रहे। हमें भी लगा कि हमने जैसे उनके ब्रह्माण्ड में बहुत बड़ा कटाव कर दिया है सो हमने और कोई दुस्साहस नहीं दिखाया और चुपचाप सीधे रस्ते दरभंगा पहुंच गए। 
वैसे पहुँचने में काफ़ी वक्त तो हो ही गया था पर हम फेरे होने से ठीक पहले पहुँच गए तो लगा कि कार्य सिद्ध हुआ। और उसके बाद जैसे ठाकुरजी को पल भर भी चैन नहीं। उनका मन तो था कि तुरंत ही वापस हों लें, फिर भी किसी तरह वो उस रात (वैसे भी पौ फटने में ३-४घंटे ही बचे थे) रुकने को तैयार हो गए ।दूसरे दिन ब्रह्म मुहूर्त में ही हम निकल पड़े। लौटते वक्त बरौनी से पूर्णिया, नवगच्छिया होते हुए घर पहुँच गए। हालाँकि बरौनी के पास एक ट्रक का जत्था मिला था लेकिन उसके बाद कुछ भी अप्रिय नहीं  हुआ और हम बड़े आराम से घर पहुँच गए। लौटने का सफर इतना नीरस था कि ठाकुरजी ने ही हमें बीच में कहीं रुकने को कहा कि चाय पी लेते हैं।
वैसे पूरे सफर में मुज़फ़्फ़रपुर-दरभंगा ही ऐसा दौर था जहॉं सुशासन बाबू का चमत्कार दिखा। चार लेन के बेहतरीन रास्ते ने मन मोह लिया और किसी बड़े हाईवे सी फ़ीलिंग भी हुई।

आजकल ठाकुरजी के बड़े सुपुत्र विक्रम ने कॉनसिलियरी का पदभार सम्भाला है। फुटकर कामों से उन्होंने अपनी कार्यकुशलता दिखानी शुरु की है और अब तो पूरा घर भी उनके देखरेख में छोड़ा जाने लगा है। 
घर छूट जाए तो हर छोटी बात को बार बार संजोने का मन करता है।और हर बार एक टीस होती है जब वापस लौटना होता है। हालाँकि यह प्रबन्ध फूलप्रूफ तो बिलकुल भी नहीं पर किसी तरह मन को मना लेते हैं कि हमारी अनुपस्थिति में कोई तो है जो माँ या पिताजी के आवाज़ देने पर दौड़ जाता है।

Thursday, November 07, 2019

महंगा सौदा

जीवन की सबसे बड़ी पूँजी 
हर सुबह 
किसी और के हाथ
छोड़ आता हूँ
जाने इस महंगे सौदे में 
कितना खोता हूँ
और क्या कमाता हूँ?

आज की फ़िक्र नहीं
कल की आस में
आसमान काटता हूँ;
जानता हूँ 
मृगतृष्णा है कल,
फिर भी खुद को बहलाता हूँ ।
जाने इस महंगे सौदे में 
कितना खोता हूँ
और क्या कमाता हूँ?

Tuesday, October 29, 2019

लॉंग वीकेंड

जब वो पेंचीदे, पोशीदा 
सी भीड़रहित सड़कें
भयावह, उजाड़, सुनसान 
अनजान लगे;
जब रस्ते की हरियाली
गुनगुनाती सी,
आसमान साफ 
और भी नीला लगे
ट्रैफिक की गलतियों पर भी
मुँह पर गाली नहीं
मुस्कान हो;
जब ख़याल लम्बे
रास्ते छोटे लगें
समझो लॉंग वीकेंड है ।

Monday, October 21, 2019

ठाठ

उस पुआल की टाट 
के नीचे
बिना खाट
ठाठ 
से, जो सोखी थी
ज़िन्दगी 

गर्माकर ललाट
चानन के घाट
जब खुशी 
नहीं मिलती थी हाट
में, जो सोखी थी 
ज़िन्दगी 

उसी ठाठ 
की आस में
आज रहे हैं दिन
पाट,
साल यूं दौड़ रहे हैं
कि हठात् 
जब हो साल 
साठ
तब होगा क्या ज्ञान,
कैसे खो दी
ज़िन्दगी 

Sunday, October 20, 2019

अलट पलट

अलट पलट
कभी पलट अलट
नट के जैसा
थिरक थिरक
इस करवट
कभी उस करवट,

अपनी नन्हीं काया को
कभी सिकुड़ सिमट
हाथ पैर को छिटक छिटक
कभी बनाती उस काया को
विकराल विकट।

सुबह लातों घूसों की
खटपट
नींद भगाती जैसे 
झटपट
पर ऑंख खुलते, मिलता
एक उपहार विशेष,
अबोध, निश्छल
मुस्कान निष्कपट!

Monday, August 26, 2019

नेब्यूलायजर


विगत दो रातों से दिल पर आरी चल रही है। करवट बदलने के बीच ही जो थोड़ा सा अन्तराल है, वरना घर-घर की आवाज हर बार एक टीस दिए जाती है और साथ में ग्लानि भी।

मायरा को बहुत ही जबरदस्त जुकाम है। और उसके बलगम अवरुद्ध कंठ से ही ये आवाज आ रही थी। हर प्रकार के घरेलू नुस्खे आजमाने के बाद जब स्थिति में कोई सुधार नहीं दिखा तो हम डॉक्टर के पास गए। उन्होंने प्राथमिक जॉंच के बाद एक दवा बताई जिसको नेब्यूलायजर के सहारे देने की सलाह दी। 

अगर आप पहली बार नेब्यूलायजर को देखेंगे तो इतने सहम जाएंगे कि इसका नाम बेबिलॉनियन महानायक (या अाताताई, निर्भर करता है आपने किस पक्ष का इतिहास पढ़ा है) नेबाकैनेड्जर ही क्यों नहीं रख दिया गया। घरघराती हुई एक बिजली से चलने वाली मशीन और उसमें २-३ फीट लम्बी ट्यूब और उसके अन्त में एक मास्क! तिस पर निर्देश - एहतिआतन बच्चों को मास्क पहनाने पर आसपास ही रहें क्योंकि एकाध दम घुटने की घटनाएं हो चुकी हैं। ऐसे यंत्र बनाते ही क्यों हो भाई जो बच्चों को ऐसा मास्क पहनाना पड़े और फिर ऐसी एहतिआत भी बरतनी पड़े जिसमें श्वासावरोध की संभावना हो। 

और अगर आप फिल्में देखते हैं और खासकर बॉलिवुड फिल्में, तो नेब्यूलायजर की सबसे नजदिकी रिश्तेदार वही मशीन लगेगी जो हीरो की कराहती मरनासन्न मॉं के चेहरे पर लगा होता है। इस ख़याल से आपके पूरे शरीर में कम से कम एक सिरहन तो दौड़ ही गई होगी, सोचिए हमारा क्या हुआ होगा।

ख़ैर हिम्मत जुटाकर हम भैया के घर से नेब्यूलायजर लेकर आए और उसी हिम्मत के भरोसे एक दवा का डोज़ देने का प्रयास किया। प्रयास इसलिए क्योंकि हमारा प्लान था कि मायरा के सोने के बाद हम दवा देंगे और चूंकि वो सो रही होगी तो प्लान तो सफल होना ही है। फिर प्लान के मुताबिक जैसे ही मायरा गहरी नींद में गई हमने नेब्यूलायजर ऑन किया। और हमारा प्लान उसी वक्त धराशाई हो गया। हमें ये ज्ञान न था कि इतनी छोटी सी मशीन इतना आवाज कर सकती है, या फिर इतनी तो जरूर करती है कि सोता हुआ बच्चा उठ जाए। 

सीख - प्लान बनाने से पहले सारे मापदंड जॉंच परख लें वरना परिणाम और उसकी असफलता के आप ही उत्तरदायी होंगे। तो नेब्यूलायजर ऑन हुआ और उसकी घरघराहट से मायरा की नींद हो गई हवा। फिर भी जैसे तैसे उस डोज़ का कार्यक्रम खत्म हुआ। असर कितना हुआ ये तो पता नहीं लेकिन हमारे मन में इस पद्धति को लेकर संशय पैदा हो गई। और उस संशय को पुख्ता करने हमारी पड़ोसी आ गईं - वैसे भी इन मामलों में पड़ोसियों को बड़ा सॉलिड ज्ञान होता है। कुशलक्षेम के पश्चात उन्होंने अपना ज्ञान पेला साथ में तर्क भी कि  नेब्यूलायजर को काम करने के लिए लम्बी सॉंसें चाहिए जो बच्चे नहीं ले पाते हैं। इन सबके बावजूद हमने एकाध बार और प्रयास किया और परिणाम ये है कि आज घर-घर कुछ कम है, नेब्यूलायजर की भी और बलगम अवरुद्ध कंठ की भी । पर ग्लानि का अब कोई क्या करे - शायद प्लान को कार्यान्वित करने के लिए ईंधन की तरह इस्तमाल।

Saturday, August 17, 2019

Chemistry and Cricket

“We will fire bullets at it, Sir!”


“Brilliant! And what would be your weapon of choice, young man?”


“A pistol or a revolver?”


“No Sir! Remember this - if it is aim-and-shoot, trust 303’s. Though a World War I weapon, it still works like a charm!”


Now, if I tell you it was an Organic/Physical Chemistry class, would you trust me? But that was Prof. Kali Dutt Bannerjee's art of teaching, he would transform a subject as bland as Organic/Physical Chemistry (at least to me) into such an interesting conversation, with trivia, fun-facts, et al.


This was his first class for our batch and he wanted us to understand what Ernest Rutherford had envisioned during his famous gold foil experiment, which ended the short lived era of Plum pudding atomic model of JJ Thomson and gave the world a new nucleus based model. As he walked in to our classroom - we would later be so influenced by his mannerisms that his normal gait would seem like a swagger to us - he spoke out loud and clear, in his crisp, accented English, “There is a gunny bag full of cotton and there are some well scattered iron balls in it. How would you find out - without touching, that excludes x-ray too - that there are iron balls in that bag?”


And this is what led to the conversation mentioned at the start.


“What is your name, young man?”, boomed the baritone, after he had pointed out that my choice of weapon was a poor one.


“Bikash”, I blurted.


“Bikash’s idea of firing bullets at the gunny bag was exactly what was experimented by a certain Mr Ernest Rutherford but at an atomic level. He fired alpha particles at a thin gold foil...”, he went on to elaborate in great detail how Rutherford’s experiment gave a brilliant new insight, literally, into the atomic world. While Prof Bannerjee continued, I, on hearing my name publicly pronounced, was elated and floating on cloud nine, hardly paid attention to any further details, thence. As I look back at it now, I think I was sucked into the winner’s trap that day - a phenomenon where the hero of the battle collects all accolades of the first win but never prepares and hence looses the impending war - notwithstanding a few answers to Prof Bannerjee’s levo/dextro Organic molecule queries or having been gifted a chocolate after the “Bowling Shane” incident.


“Bowling Shane!” - Adam Gilchrist, had then recently joined the Australian ODI team(“The Invincibles” of late 90’s and early 2000’s) and his peculiar style of uttering the words of encouragement, caught by the stump mic, was an absolute hit among cricket crazy fans, like us. Shane Warne, the greatest leg spinner the world has seen, was another hero who was ironically toiling hard in Indian conditions in that series, to make a mark. Post the Australian tour of India of ‘90s, Gilchrist became a permanent fixture, replacing another great, Ian Healy. Gilly though, in that tour and to us, was known mostly for his “Bowling Shane”, behind the stumps.

The finals of the inter-class cricket tournament that year, was scheduled between Std XI (I was the 12th man in the Std XI squad) and Std X. Manik Shankar, was our local Shane Warne - with a style matching Warney and a much better relative record to boast of. Before the start of the match while we were planning our strategy, Prof Bannerjee walked in. Like most of the Bengali bhadralok, he too was a big fan of cricket and was there to enthuse and encourage both the teams. We arranged for a chair and cajoled him to sit on our side. We had set a tough target to chase and as the second innings of the match progressed, Manik was introduced to the attack. I was sitting behind Prof Bannerjee and as soon as Manik found his rhythm I started mimicking Gilly (unlike him though I wasn’t behind the stumps but sitting behind a man who was an alert audience), at the top of my voice, unabashedly and quite frequently after every turning ball - “Bowling Shane!”.
Owing to our superlative performance, the match ended in our favor. I remember Suman running all the way from the stadium to the middle of the ground to congratulate our cricket captain, almost hugging him. The next day when Prof Bannerjee’s class was about to start, he pulled out two Dairy Milk chocolates and handed one to Suman and the other to me, stating that an encouraging audience, sometimes is the difference between a winning and a loosing team.


Legend has it that Prof KD Bannerjee and his team were working on a PhD thesis, funded by the Central government. They also had frequent mail exchange with an American University team, which was working on a similar idea. It was late 60’s and while the research was in full swing, all of a sudden without any consent from Prof Bannerjee’s team, the funding was stopped. The disheartening thing wasn’t that funding stopped all of a sudden but the news that the American team went ahead with their research and were awarded Nobel Prize in Chemistry for that. Discouraged yet unperturbed, Prof Bannerjee continued to serve Chemistry and after his retirement decided to train young guns like us, pun intended.

Friday, August 09, 2019

दाहिने हाथ की मध्यमा

“कनिष्ठा में मून स्टोन या मोती, अनामिका में मूंगा, दाहिने हाथ के मध्यमा में गोमेद, बॉंयें हाथ के मध्यमा में घोड़े के नाल या नाव के कॉंटी की अंगूठी । इतना तो जैसे अनिवार्य ही है। बाकी अगर ग्रह गोचर की दृष्टि और भी वक्र है तो तर्जनी में टोपाज़ नहीं तो सोना पहनिए और अंगूठे में रुबी”, पंडितजी धड़ल्ले से बताते चले गए। 

“अब सबको सब ‘पत्थल’ सूट नहीं करता है और किसी किसी को दसों उंगली में भी पहनना पड़ सकता है”, थोड़ा और ज्ञान भंडार खोला पंडितजी ने और भागलपुरियों में पत्थर के प्रचलित अपभ्रंश को भी बेहिचक इस्तमाल कर गए। 

हमारा उनसे सवाल काफी सरल था कि कौन सी उंगली में कौन सा ‘पत्थल’ पहनना चाहिए, लेकिन चूंकि उनके चाचा राष्ट्रीय स्तर के बड़े ही जानकार ज्योतिष थे - उन्हें जैल सिंह के हाथों पुरस्कार भी मिला था, जिसका साक्षात सबूत कमरे में घुसते ही सामने वाली दीवार पर था - इन्हें भी ऐसा दर्शाना था कि इनका ज्ञान उनसे उन्नीस नहीं है!

लेकिन दाहिने हाथ की मध्यमा का असली महत्व, शायद पंडितजी भी नहीं जान पाए थे और जानते भी कैसे क्योंकि ये अंग्रेजों की नहीं वरन अमेरिकियों की ईजाद की गई भाषा है। और अगर अमेरिकी फिल्मों से पंडितजी का पाला पड़ा होता तो उनके ज्ञान का भी विस्तार हुआ होता या फिर शायद पंडितजी इन ऊँचाइयों की जगह कहीं और की गहराईयों में गोते लगा रहे होते। 

इन विषयों में हमारे भी ज्ञान चक्षु बैंगलोर आकर ही खुले। वैसे तो हमें मादर-ए-ज़बान के अपशब्द बखूबी पता थे, लेकिन आंगल भाषा में इन शब्दों का तरजुमा किसी ने नहीं बताया था। फिर जब बैंगलोर आकर पता चला कि अंग्रेजी में भी ऐसी शब्दावली है और साथ ही ऐसे हावभाव हैं जिनसे आप बिना बोले भी बहुत कुछ बोल सकते हैं, तब हमें एहसास हुआ कि कितना ज्ञान भरा पड़ा है इस संसार में और सीखने को कितना कुछ बाकी है! 

हालांकि, उस वक्त कुछ धुंधली यादे थीं हमारे जेहन में - जिसमें ‘डब्ल्यू डब्ल्यू ई’ के खतरनाक लड़ाके, चाहे वो ‘द रॉक’ रहें हों या ‘स्टोन कोल्ड स्टीव ऑस्टिन’, जब भी एक दूसरे को गरियाते हुए अपना हाथ उठाकर कुछ इशारा करते थे तो उनके मध्यमा के इर्द-गिर्द धुंधलका सा छा जाता था; शायद इसलिए यादें भी धुंधली ही थीं। पर उस वक्त हम इसे दृष्टिदोष समझ अनदेखा कर देते थे। 

बात पहली बार उस वक्त प्रकट हुई जब एक स्थानीय सहपाठी से किसी विषय पर बहस हो गई। हम तर्क पर तर्क दिए जा रहे थे और वो झल्लाया जा रहा था। अन्त में उसी ने सबसे पहली बार हमारे चेहरे के सामने दाहिने हाथ की मध्यमा को लहराया और ‘आक थू’ सा कुछ बोलकर अपने रास्ते हो लिया। हमने भी उसके मुड़ने के बाद बेवकूफों की तरह खखार मारकर थूकते हुए उसकी तरफ मध्यमा से वैसा ही एक इशारा कर दिया था। ये समझ तो तब पुख्ता हुई, जब हमें अंग्रेजी फिल्मों का चस्का लगा और उन फिल्मों में यदा कदा मध्यमा का इस्तमाल देखा (बिना किसी धुंधलके के)। शनै:-शनै: हम भी इसके इस्तमाल में पारंगत हो गए, साथ ही ये भी पता चला कि वो ‘आक थू’ जो हमारे दोस्त ने हम पर बरसाया था वो भी एक चार अक्षरों का अपशब्द है। आश्चर्य तो इस बात का है कि आजकल हमारे अपार्टमेंट में ये अपशब्द बच्चों के मुँह से भी कई बार सुन चुका हूँ - मतलब हमने एक तिहाई ज़िन्दगी निकल जाने के बाद जो ज्ञान अर्जन किया, यहॉं पर ये बच्चे दूध के दॉंत टूटते टूटते ही सीख गए हैं।

हमारे साथ एक और किस्सा हुआ जिसमे हमें ये सीख मिली कि मध्यमा का इस्तमाल कभी कभी जानलेवा हो सकता है। यह एक मध्यरात्री की कहानी है जब हम अविवाहित थे और दिशाहीन, लक्ष्यहीन ३-४ दोस्तों के साथ, अपने दोस्त की गाड़ी में भ्रमण पर निकले थे। उन दिनों कोई हमारी गाड़ी को ओवरटेक कर ले तो फिर हम इसे खुला आमंत्रण मान लेते थे और फिर क्या -आखेट चालू! ऐसे ही एक आखेट की कहानी है ये।

मध्यरात्री का वक्त, खुली फ़िज़ा और एकांत सी एक सड़क पर सरपट भागती दो गाड़ियॉं। हमारा अभी इस विषय में (अन्य विषयों के ही तरह) ज्ञान थोड़ा संकीर्ण था पर जोश में कोई कमी नहीं थी। थोड़ी देर के बाद जब कोई स्पष्ट विजेता का निर्णय नहीं हो पाया तो हमलोग थोड़े शिथिल पड़ गए। तभी हमारी प्रतिद्वंदी कार हमारे ठीक सामने आकर रुक गई और उसमें से चार मुस्टंडे, भिन्न भिन्न प्रकार के हथियारों से लैस, उतरे। हमारे दोस्त ने भांप लिया कि कुछ अनिष्ट होने वाला है (भांप तो हमने भी लिया था पर हमें जैसे सॉंप सूंघ गया था - शरीर के हरकत की तो बात ही न करें, हमारे मुँह से चूं तक नहीं निकल पाई थी) और उसने तुरंत रिवर्स लेकर फिल्मी अंदाज़ में ‘यू’ मारकर गाड़ी को फिर से हवा की सैर कराई। 

जब हमारे कुछ जान में जान आई तो बात चली कि ऐसे कौन से लोग थे और आखिर ऐसा क्या हुआ था, जो बिना किसी चेतावनी के हमारे रक्त पिपाषु हो गए थे। इस पर हमने अपने नौसिखिये जोश और उस जोश की संगिनी दाहिने हाथ की मध्यमा पर दोष जड़ा। चारों दोस्त वैसे ही डर, दहशत, गुस्से और असमंजस के चतुरंग में नहाये हुए थे, फलत: उन्होंने दिल खोलकर शुद्ध भाषा में हमारी बुद्धी और जोश को अलंकृत किया। उस दिन हमें समझ में आया कि दाहिने हाथ की मध्यमा कितनी बीभत्स हो सकती है और उसी दिन (या मध्यरात्री) हमनें इस भाषा, हावभाव और साईन लैंग्वेज में स्नातकोत्तर की पदवी पा ली!

Tuesday, August 06, 2019

कॉल

“वी विल ऑप्टिमाईज़ मेमरी यूसेज विथ दिस!”, अरुण ने ऐसे कहा जैसे अपने प्रस्ताव के पक्ष में एक बहुत बड़ी दलील दी हो!
रात के दस बज चुके थे और नज़ारा वही था जो आजकल बहुत ही आम हो चुका है। कुछ काम को लेकर पश्चिमी और पूर्वी देशों में बैठे इंजीनियर्स आपस में परामर्श कर रहे थे, जिसे आजकल एक बहुत ही सरल संज्ञा, ‘कॉल’ के नाम से जाना जाता है। 

जहॉं पूर्वार्ध में सूर्यास्त हुए कई घंटे बीत चुके थे वहीं दूसरे छोर पर सूरज अभी अपने परवान तक भी नहीं पहुंचा था। साथ ही दोनों पक्ष से तर्क - वितर्क में कोई कोताही भी नहीं बरती गई थी, न ही वो किसी आम सहमति पर पहुंच पा रहे थे। इन्हीं बातों के दौरान अरुण ने ये अचूक बाण दागा था।

थोड़ी देर तक दोनों ओर सन्नाटा छाया रहा और फिर जैसे ही श्रीनि ने अरुण के तर्क के काट में ये शब्द कहे - “आई सी वेयर यू आर कमिंग फ्रॉम...” (आजकल ये भी क्या खूब पूरक है जहॉं आप अपनी काबीलियत भी दिखा देते है, औपचारिकता की कोई सीमा भी नहीं टूटती और लाख टके की बात - आप पूरे ग्रुप में अपनी असहमति भी साझा कर देते हैं) तभी नैपथ्य से आजकल के बच्चों को डिनर कराने में सुपरहिट सहायक सिद्ध होता हुआ वो गाना गूंज उठा - “लकड़ी की काठी, काठी पे घोड़ा, घोड़े की दुम पे जो...”।

फलत: ठहाकों का दौर चला, सब खूब खिलखिलाए, खूब ठिठोली हुई - हॉं, मगर सभी लोगों के माईक्स म्यूट पर थे! 

पिताओं के इस समूह में कुछ माताएं भी थीं और हम कितना भी कह लें कि अब हमारा समाज पुरुष प्रधान से स्त्री प्रधान होता जा रहा है, आज भी कई ऐसे कार्य हैं जिन्हें करने में पुरुषों के हाथ पैर फूल जाते हैं - छोटे बच्चों को खाना खिलाना भी वैसा ही एक कार्य है जिसपर महिलाओं का एकाधिपत्य है। और इस गाने ने ऐसी विहंगम छटा बिखेरी है कि हर बच्चा यह गाना सुनते/देखते ही मदहोश होकर, निश्छल प्रेम से मुँह खोल देता है और माताएं अपनी बहुकार्य पारंगत छवि को और निखार लेती हैं। और इसी बहुकार्यण के दौरान किसी का माईक अनम्यूट रह गया और पूर्वार्ध से पश्चिमार्ध तक इस गाने की महिमा ध्वनि तरंगों में परिवर्तित हो गई।

इस महिमा से कम से कम हम पर भी वैसी ही मदहोशी छा गई जैसे उस बच्चे पर छाई होगी। कुछ समय का भी असर रहा होगा और थोड़ी सी नीन्द (जिसकी कमी भी आजकल एक आम बात है) की खुमारी भी दोषी थी, हम आगे सुन तो पाए पर कुछ समझ नहीं पाए। 

तो फिर निदान ये होता है (ये हमारी इंडस्ट्री की अंदर की बात है) कि एक और ‘कॉल’ रख दिया जाता है, जिसमें “वी विल टॉक अबॉउट इट इन मोर डिटेल” वाला दॉंव फेंक दिया जाता है। हमने वही किया और दूसरा अवतार लेकर हम चल पड़े, वहॉं जहॉं उस गाने का असर हम अपने घर में चरित्रार्थ कर रहे थे - “घोड़ा पहुंचा चौंक पर, चौक पे था नाई, नाईजी ने घोड़े की हजामत जो बनाई”। और हजामत जिनकी होनी थी, वो अगले कॉल की तैयारी में लग गए थे।

सब कुछ

हाड़ मांस का ये शरीर   प्राण जैसा कुछ तो है कहते हैं जिसको आत्मा  जान गए तो सब कुछ है। नासमझी की है रैली पुरज़ोर है आडम्बर, बह गए तो व्यर्थ ...