Tuesday, May 02, 2023
मात्रात्मक दोष
Tuesday, April 04, 2023
घर या होम?
Friday, March 31, 2023
आप कितने सोशल हैं
Thursday, January 26, 2023
चाय में चीनी
Saturday, January 07, 2023
अब वो बातें बनाना सीख रही है
मीठी चाशनी में घोल
जबेली सी मोड़ दे रही है;
आँखों को गोल-गोल कर
हाथों को इधर-उधर फेंक,
शब्दों में भाव भर रही है,
अब वो बातें बनाना सीख रही है।
कभी हल्के, कभी भरकम
तौलकर, कभी नापकर
आड़े-तिरछे कभी बुनकर,
अपने भुने मसालों को
जैसे चखकर;
रसीले पकवान परोस रही है,
अब वो बातें बनाना सीख रही है ।
Saturday, October 08, 2022
गुम नाम
पिछले महीने भूपिन्दर सिंह का देहांत हो गया। बड़ी बड़ी ऑंखों पे घने परदों सी पलकों वाले भूपिन्दर जिनको लोग प्यार से भूपि जी भी कहते थे।
बहुत ही यूनीक गहरी, अनुनासिक आवाज़ के मालिक भूपि जी सत्तर के दशक में मिडिल क्लास की आवाज़ बन गए थे- “एक अकेला इस शहर में” से लेकर “ज़िन्दगी सिगरेट का धुआँ”। शायद एक्सपेरिमेंटल फ़िल्मों के लिए उनकी ही आवाज़ की ज़रूरत थी।
अगर आप “टी वी एफ” के फ़ैन हैं तो आपने नोटिस किया ही होगा कि “परमानेन्ट रुममेट्स” में उनके एक गाने को क्या ज़बर्दस्त सेट किया गया है - “एक ही ख़्वाब कई बार देखा है मैंने”। ये गाना धर्मेंद्र पर फ़िल्माया गया था और भूपिन्दर की आवाज़ क्या सटीक बैठती है उनपर। नए रूपांतरण में बैचलर्स पैड में एक लड़की का आना, वक़्त का थम जाना और भूपिन्दर की आवाज़ - फिर से वैसी ही सटीक। बेहतरीन लेखनी, अव्वल चित्रांकन और आवाज़, दो-तीन जेनेरेशन पुरानी पर जो दोनों दृश्यों में बिल्कुल बराबर असर करती है।
उसी फिल्म, किनारा, के २-३ और गाने जैसे “नाम गुम जाएगा”, “मीठे बोल बोले”, तो जैसे उनके लिए ही बने थे। पंचम ने भी भूपिन्दर की बाकी हुनर का भरपूर इस्तेमाल करने के बाद आख़िरकार उनके गायिकी का भी बख़ूबी उपयोग किया।
भूपिन्दर के ही एक गाने ने हमें एक और नगीने से परिचय कराया - निदा फ़ाज़ली!
“कभी किसी को मुकम्मल जहां नहीं मिलता,
कहीं ज़मीं तो कहीं आसमाँ नहीं मिलता”
“दम मारो दम” हो या “चुरा लिया है तुमने जो दिल को” का रोमांटिक गिटार, भूपिन्दर कई विधाओं में दक्ष थे।
“दिल ढूँढता है” में जितना जादू गुलज़ार के शब्दों का है, उतना ही योगदान भूपिन्दर की आवाज़ का है। “जाड़ों की नर्म धूप” वाले अंतरे में तो उनकी आवाज़ की गर्माहट तक को महसूस किया जा सकता है।
अस्सी के दशक में उनके ग़ज़लों ने भी ख़ूब धमाल मचाया और साथ ही साथ “आवाज़ दी है” या “किसी नजर को तेरा” ने जैसे एक हॉंटिंग मेमरी बना दी।
उनके बारे में कुछ लेख पढ़े तो ज्ञात हुआ कि वो हक़ीक़त फ़िल्म से शुरुआत करते हुए रफ़ी, तलत जैसे दिग्गजों के साथ गाना गा चुके हैं। और कई फ़िल्मों में अपने ही उपर गाते हुए फ़िल्माए भी गए हैं। पर उनकी आवाज़ चूँकि टिपिकल हिन्दी फ़िल्म हीरो को सूट नहीं करती थी इसलिए अमूमन उनको बैकग्राउंड सिचूएशन में ही इस्तेमाल किया जाता रहा।
सत्तर-अस्सी के दशक में जब एक्सपेरिमेंटल सिनेमा का दौर शुरू हुआ तो भूपिन्दर को एक नया स्टेज मिला।
फ़ारुख़ शेख, नसीरुद्दीन शाह, आमोल पालेकर के लिए उन्होंने कुछ यादगार गीत गाए। उससे पहले गुलज़ार ने अपनी फ़िल्मों के लिए भूपि जी का कुछ इस तरह इस्तेमाल किया कि वो गाने फ़िल्मी गीतों के लिए एक अलग ही आयाम बन गए।
“जब तारे ज़मीं पर…तारे और ज़मीं पर? ऑफ़ कोर्स” - ये इतना कैजु़अल वाला ऑफ़ कोर्स, जब से सुना था हमें भी बोलने का बहुत मन था। और फिर हमने ट्विटरपर पढ़ा कि बहुत सारे लोग इस “ऑफ़ कोर्स” के कायल थे।
और एक कहानी तो हम हर बार दोहराते हैं कि कैसे हमें एक गाने का सिर्फ़ एक शब्द याद था और उससे डी ने पूरा गाना ढूँढ लिया था। निस्संदेह डी के गाने का टेस्ट और पहचान ज़बरदस्त है पर इस बार ज़्यादा श्रेय हम देंगे भूपि जी की अंदाज़-ए-गायकी को और एक आना हमारी मिमिक्री को।
भूपि जी के ही गाए हुए शब्द उनके लिए उपयुक्त बैठते हैं -
“नाम गुम जाएगा, चेहरा ये बदल जाएगा
मेरी आवाज़ ही पहचान है, ग़र याद रहे”
रोग
Friday, July 08, 2022
भागलपुरिया रेनेसॉंस
सन सत्तानवे का वो दसवीं बैच था ही ऐसा कि रेनेसॉंस जैसा शब्द ही उसके लिए उपयुक्त होगा। चुन चुन कर हीरे जवाहरात से जड़ा हुआ जत्था था। कुल मिलाकर क़रीब १२० के इस ग्रुप में कम से कम पंद्रह बीस तो ऐसे थे जो एक से ज़्यादा विधा में पारंगत थे - पढ़ाई के अलावा। और जो बचे वो अगर एक आयामी भी थे तो ज़िंदगी के मज़े लेने तो ज़रूर जानते थे। कुंठा इन्हें छू भी नहीं पाती थी।
चलिए कुछ किरदार चुनते हैं और उनके हरफ़नमौलापन की चर्चा करते हैं -
अब ऐसे हीरे पन्नों में कहाँ से श्रीगणेश करें ये भी एक विषम मुद्दा हुआ जा रहा है। चलिए रैंडम फ़ॉरेस्ट ही उठाया जाए। और रेफ़्रेंस सत्तानवे ही रहेगा क्योंकि अब सर पर गिने चुने बाल, तोंद फुलाए अधेड़ों की बात करें तो क़िस्सा अलग ही रुख़ ले लगा।
पगलु - क्या गाता था! किशोर, रफ़ी सा मंत्रमुग्ध कर जाता । और वही फिर खेल के मैदान में रोनाल्डो (ब्राज़ील वाला) सा माहिर! आपको क्या लगा बस - अरे नहीं, क्रिकेट और फुटबॉल दोनों में धुरंधर। तिसपर से खुश मिज़ाज इतना कि इनके शब्दों से पहले इनकी मुस्कान आप तक पहुँच जाती थी।
तानसेन - आहा हा! कवर ड्राइव मार्क वॉ सरीखे, मक्खन पर गर्म चाकू सा। ओपनर के लिए डिफ़ॉल्ट चॉइस।पक्का जेंटलमैन, बहुत शातिर दिमाग़ जो पढ़ाई और मौज-मस्ती में बराबर बंटता था। चटकोर ऐसा कि उस चक्कर में एकाध बार प्राचार्य महोदय की नज़र में चढ़ चुका था - जो जानते थे कि बच्चों की कितनी और कहाँ छँटनी करनी है।
पोंगी - लेखनी हो, फ़्री किक हो या दिमाग़ी दॉंव-पेंच, सब में माहिर! और ऐसा माहिर कि उपनाम के पीछे कहानी बताने की आवश्यकता न हो शायद। पोंगी, पोंगा पंडित का ही अपभ्रंश है। दिमाग़ और याददाश्त का ऐसा कॉकटेल कि प्राचार्य महोदय के शेक्सपीरियन ड्रामेबाज़ी को वहीं के वहीं धराशायी करने में सक्षम। लेकिन भुटानी और दिप्पा इनकी इतनी टॉंग खिंचते थे कि कभी भी, कम से कम, हमारे बीच इनको वैसी इज़्ज़त न मिल पाई। मुहल्ले की मुर्ग़ी आख़िर दाल बराबर ही होती है।
गोलका - शारीरिक विशिष्टता को दरकिनार कर देते हैं। यह लड़का टेबल टेनिस कैसे खेल सकता था। छोटकी राहुल और कैफ़ी के साथ ये हमारे जोकर, राफ़ा और फ़ेडरर की तिकड़ी थी। और वैसा ही क्रिकेटर - हम नहीं बोल रहे पर सब कहते थे कि इंज़माम-उल-हक़ वाली वाईभ्स आती थी इनसे। गायकी तो इनकी विशिष्टता थी ही। पेट से इतना मधुर गाने का चलन जिसने भी शुरु किया हो, गोलका ने इसे एक नए स्तर पर पहुँचा दिया था।
चड्डी सिंह - अव्वल दर्जे का कलाकार। गाना गवा लीजिए तो वैसे ही हर हर्फ़ में खनक और उपर्लिखित सारे गायकों को काँटे की टक्कर देने वाला, स्केचिंग करवा लीजिए तो क्या हर्ज और क्या वाटरसन। आब-ए-हयात का ऐसा बीमार कि चार लड़कियों को खड़ा कर दीजिए गोल पोस्ट के पीछे और मजाल है कि एक भी पेनल्टी गोल में घुस जाए!
ऑंटी - उस ज़माने में सिद्धार्थ बसु के क्विज़ प्रोग्राम में शिरकत कर आए थे जब वो “दी सिद्धार्थ बसु” हुआ करते थे। अक्खड़ तो थे ही और इनके कटाक्ष से आहत होकर मुँह छिपाने की जगह भी नहीं मिलती थी।
झा बिरादर्स - यारों के यार। द्रुत दिमाग़ और वैसा ही कार्यान्वयन। प्रैक्टिकल जोक्स तो ऐसे कि शिकार खुद दाद देने पर मजबूर हो जाए। विमल, विक्रांत और पोंगी अफ़सानानिगार की तिकड़ी - जिनके लेख पूरे क्लास के सम्मुख पढ़े जाते थे। अमल एकदम खरा सोना, तौलिए तो एकाध पाव उपर ही!
कैफ़ी - आलू। किसी भी माहौल में घुलने की क्षमता रखने वाला। क्लास में टीचरों की चुटकी लेने वाला जीवट। हमारी टीम का वसीम अकरम और चंडाल चौकड़ी का सरगना। और पच्चीस साल बाद इस समूह को चिपकाने वाला गोंद!
चिकना - मोहल्ले का स्टार खिलाड़ी और पहला ऐसा केस जो सिर्फ़ अपने सन्नी टोनी के भरोसे टीम में शामिल नहीं होता था। रक्षित और चिकना हुए हमारे ओजी। अपशब्द के उच्चारण से लेकर उनका सही उपयोग, इतना गहन ज्ञान और उनका इतनी सरलता से वितरण वो भी मुफ़्त- ऐसे सन्त महात्मा बिरले ही अवतरित होते हैं।
पीडी - जितने आराम से केमिकल फ़ार्मूला बकते हुए इक्वेशन बैलेंस करता था उतने ही मज़े से फ़ील्ड गोल कर सकता था। न चाहते हुए भी खटास का चहेता।
पाठक - सबका पंचिंग बैग। हमारा पड़ोसी और हमको बुरा भी लगे कि दोस्ती का अव्वल उसूल हम नहीं निभा पाते थे। पर उस उमर में कोई ख़ुद पर हँसना इनसे सीखे। और बहुत लोगों को पता नहीं होगा कि इनके गीतों का कलेक्शन किसी तलबग़ार से कम नहीं था और वो भी तब जब न इंटरनेट था और ना ही आई ट्यून्स! बैडमिंटन में अपने नेमसेक सुसी सुशान्ती जैसा ही प्रतिभावान।
अब आप ही बताइए इतने ज़िंदगी से भरे, क्रिड़ात्मक, सांस्कृतिक, आध्यात्मिक मंडली में कोई कैसे सर्वरुपेण विकास से वंचित रह सकता है। फ़्रेंच में एक फ़्रेज़ है - ज्वा दा वीव। फ़्रांसीसियों की तो आदत है, लिखते कुछ हैं, पढ़ते कुछ, तो आपको जो उच्चारण और वर्तनी पता है आप वही पढ़ लें। सरल शब्दों में इसका अर्थ हुआ ज़िंदगी की ख़ुशी और ये टोली थी भरपूर ज्वा दा वीव से ओत प्रोत। वैसे ये हमारे टीचरों की भी सोच है कि वैसा बैच फिर कभी नहीं आया। शायद ज़माना ही अलग था जहॉं एक तरफ़ डीसिप्लिन के नाम पर हम पिटते भी थे, वहीं उस से बचने के लिए नये नये तरकीबें भी ईजाद करते थे। गुरुओं का वो प्रसाद तो शायद अब लुप्त ही हो गया है, जिसके लिए कबीर ने कहा था -
गुरू कुम्हार शिष कुंभ है, गढि़ गढि़ काढ़ै खोट।
बेढंगे मिट्टी को जीवन के हर ठोकर के लिए तैयार अगर कुम्हार रुपी गुरु करते हैं तो ऐसे दोस्त भट्टी की गर्मी बाँट आपको चहुँओर से सुडौल बनाते हैं।
और हमें चकबस्त की बात से बिल्कुल ही इख़्तियार नहीं - जुहूर-ए-तरतीब से तो बस मिट्टी के माधो निकलेगें, असली ज़िंदादिली है अज़्जाओं का परेशान होना।
Tuesday, May 31, 2022
लता मंगेशकर
एक लम्बी तान बार-बार सुनाई तो दे रही थी लेकिन कभी-कभी ऐसा होता है न कि गुनगुनाए बिना आपको वह गीत याद ही नहीं आती। उस दोपहर ऐसा ही हो रहा था। और चूँकि एक चौथाई दिमाग़ काम में लगा था हर बार उस गीत के मुखड़े तक पहुँचने से पहले शब्द जैसे फिसल से जा रहे थे। न काम ही हो पा रहा था और न ही गाने की पहचान! कुछ देर तक यही जद्दोजहद चलती रही और फिर गाना बंद हो गया।
अब तो मन जैसे तिलमिला सा गया। लैपटॉप बंद कर उसी तान के बारे में सोचने लगे। आवाज़ तो लताजी की थी इसमें कोई संदेह नहीं था। कुछ दिन पहले उनका देहांत हुआ था तो शायद किसी ने उस दोपहर लताजी को स्वरांजलि देने की ठानी थी। जिस दिशा से आवाज़ आ रही थी वो इतनी ही दूरी पर थी कि धुन साफ-साफ आ रही थी पर बोल आसपास के शोर में घुल जा रहे थे। मन उस तान में उलझा हुआ ही था कि अगले गाने के कुछ शब्द बिलकुल स्पष्ट सुनाई दे गए।
“तेरी भी ऑंखों में ऑंसूओं की नमी तो नहीं…तेरे बिना ज़िंदगी से कोई शिकवा तो नहीं।”
इन शब्दों ने तो जैसे एक सैलाब ही ला दिया। हम उन काबिलों की श्रेणी में आते हैं जो समझते थे कि लताजी एक धाक वाली गायिका थीं, जिन्होंने अपने प्रतिस्पर्धियों का करियर “बाय हुक ऑर क्रुक” ख़त्म करवाया था ताकि उनका एकछत्र राज चलता रहे। साथ ही हम ये भी मानते थे कि उनको नब्बे की शुरुआत बल्कि अस्सी के उत्तरार्ध में ही गाना छोड़ देना चाहिए था। पर जैसा भी हमारा आँकलन हो ये तो तथ्य है कि उनकी गायकी अलग ही दर्ज़े की थी।
कितनी बार ये गाना सुना होगा और लताजी के देहांत के बाद शायद पहली बार। चार दशकों की यादें चुभने लगी और यादों की जमघट से ये शब्द भी निकल कर आए -
“तू खेले खेल कई, मेरा खिलौना है तू…”
उस वक़्त की, बिना समझे, बस मॉं की गोद और गाने की धुन याद है; लताजी इंट्रोड्यूस हुई थी मॉं की लोरियों से। लड़कपन तक आते आते, दिल तो पागल है का “अरे रे अरे ये क्या हुआ…” सुनकर लगता था कि कितनी बकवास आवाज़ है। लेकिन उसी दौरान “कभी ख़ुशी कभी ग़म” के लम्बे आलाप से जैसे मन विचलित हो जाता था। माहौल ही ऐसा था की बैंगलोर का अकेलापन और भी सूना हो जाता था। वही कहते हैं न कि कुछ चीज़ों का असली महत्व उमर होने पर ही समझ आता है। जैसे मुकेश की गायकी तभी समझ में आती है जब आप उमर की एक दहलीज़ पार कर जाते हैं।
अधेड़पन आते आते ऑंधी, अराधना, गाईड के गानों के नए मायने मिलते गए। इन दशकों में लताजी के गाने और भी नौस्तैलजिक लगने लगी।
“कहॉं गईं शामें, मदभरी वो मेरे, मेरे वो दिन गए किधर”!
शब्दों में इत्र योगेश के थे तो रंगों के अलग-अलग शेड लताजी की तान ने भरे थे। गाने में शब्दों का महत्व तो है ही पर कैरियर तरंगों के बिना वो शब्द शायद वहाँ पहुँच ही नहीं पाएँ जहां से और जहां के लिए उन्हें लिखा गया है।
उस दोपहर की स्वरांजलि में कई बेहतरीन गाने बजे और सच में ऐसा लगा कि हिन्दी फ़िल्मों की आत्मा थीं लता मंगेशकर। मेरे लिए तो चार दशक थे लेकिन लताजी चार-पाँच जेनेरेशन्स से गा रहीं थीं। शुरुआत की तान, जिससे ये यादों का सैलाब उठा था, अब भी खटक रही थी। हमने सोचा कि डी से ही पूछ लें क्योंकि उनका रेंज और गाने पहचानने की कला हमसे कई कदम आगे है। मसलन एक दिन हम गाने के बोल, धुन सब भूल गए थे और सिर्फ़ एक शब्द याद था - दरवाज़ा! इस शब्द से ही डी ने बता दिया कि गाना बाज़ार फ़िल्म का वो बेहतरीन नज़्म है - “करोगे याद तो”! और तभी हमारा माथा ठनका कि वो गाना तो बाज़ार फ़िल्म का ही था। उफ़! ख़ालिस उर्दू में लिखा हुआ ये गाना जिसके कुछेक शब्द और भाव तो अभी भी समझ में नहीं आते। उस वक़्त, थोड़े से बदलाव के साथ हम उसी फ़ीलिंग में गोते लगा रहे थे - “सुनाई दिए यूँ कि बेख़ुद किया, हमें आप से ही जुदा कर चले!”
Monday, May 23, 2022
बात
रुम की साईज़ थी करीब १०’X१२’ फीट, जिसमें आवाजाही के लिए एक दरवाज़ा था और बाईं और दाईं तरफ़ खिड़कियाँ थीं। बाईं खिड़की थोड़ी छोटी थी, जिसके साथ एक थ्री सीटर सोफा लगा था। एक किंग साईज़ बेड सामने वाली दीवार से सटा हुआ था और इन दोनों के बीच एक प्लास्टिक की कुर्सी किसी तरह फ़िट कर दी गई थी। बेड का एक सिरा दाएँ खिड़की तक था, जिससे बाहर के मिनी गार्डन की झलक मिलती थी।
इस रुम में करीब घंटे भर से एक महत्वपूर्ण बात चल रही थी। कितनी महत्वपूर्ण, ये आप उस रुम के लोग, उनकी उमर और उनके पोज़ से कयास लगा सकते हैं।
बेड पर तीन अधेड़ उमर वाले सर झुकाए बात सुनते और बीच-बीच में सर उठाकर कभी-कभी अपना तर्क दे रहे थे। उनमें से एक दीवार से टिककर लेटा हुआ था। बाकी दो अपने दोनों पैरों को मोड़ कर बैठे थे।
रुम के दो सीनियर सिटीज़न बहुत गम्भीरता से सबकी बात सुन रहे थे। एक बाईं तरफ़ वाली थ्री सीटर पर वज्रासन में बैठे थे और दूसरे प्राणायाम करते हुए उस सोफे और बेड के बीच वाले प्लास्टिक वाली कुर्सी पर। बाक़ी लोग जिन भावनारहित शब्दों का प्रयोग उस घर के लिए कर रहे थे वहॉं उनका बचपन बीता था। अब भले ही वो जर्जर हालत में हो पर उनके लिए तो वो घर भावनाओं और यादों का पोर्टल था।
गहमागहमी तब शुरू हुई जब दो और लोग वहाँ दाखिल हुए। उन महिला के लिए इज़्ज़त सबकी आँखों में दिख रहा था पर माहौल ऐसा बना हुआ था कि बस उनके लिए किसी तरह उस थ्री सीटर पर जगह बना दी गई । दूसरे आगन्तुक के लिए दरवाज़े के पास ही एक और प्लास्टिक की कुर्सी का इंतज़ाम कर दिया गया।
इन दोनों के उस रुम में आने से वैसे बातों में नई ऊर्जा आ गई थी। ऐसा लग रहा था कि इन्हें नए विस्तार और घर, खलिहान का ज़्यादा अनुभव था। और कुछ अल्पज्ञान, कुछ स्वाभिमान, कुछ ऐसी बातों का दुःख, सबने मिल-जुलकर दबी आग को जैसे हवा दे दी। ऐसा लगा कि मतभेद खुलकर सामने आने लगे। पर सीनियर सिटीज़नों की ख़ामोशी ने फिर से सब कुछ शांत कर दिया।
बीच बीच में एक और भागीदार का उस रुम में आना-जाना लगा हुआ था। यह आदमी बेड के बिल्कुल किनारे बैठकर सबकी बात सुन रहा था और उसके पोज़ से उसकी दिलचस्पी झलक रही थी। ये आदमी है आपकी कहानी का सूत्रधार।
वैसे ऐसी बातों का एक बैठक में निष्कर्ष निकलना मुश्किल ही होता है। पर जहॉं पर ये बातें ठिठक सी गई वो था एक शब्द । वैसे तो सब को पता ही था कि कौन से मुद्दे पर बात हो रही है और सब चाहते थे कि सारी बातें बिना किसी खटास के हो जाए। बोलने वाले को भी उस शब्द का वजन बाद में ही समझ आया होगा। पर वाक बाण तो छूट चुका था और पहले से ही छलनी हो चुके हृदय के लिए एक वज्रपात सा कर गया वह शब्द- बँटवारा!
Tuesday, May 17, 2022
अभिमन्यु
Tuesday, March 22, 2022
गुटबाज़ी
खेला होता आर-पार
माला जपो सोशल मीडिया पर
घड़ी-घड़ी पाओ नया अत्याचार!
हर रोज़ नया नया रंग
कभी केसरिया
कभी लाल
गोता लगाकर सने रहो
लाओ नया भूचाल!
एक रोज़ रंग फ़क़ीरी का
एक रोज़ बादशाही अमीरी का
हर जिरह जंग जैसे
मसला घरेलू और करीबी का।
वो खेल का मैदान हो
या सियासत का आखेट
दो-दो हाथ और कोई करता
खाते हैं हम फरेब!
रोज़ बँट कर
गुट लेना है चुन
काम काज सब तख़्ता पर रखकर
माथा में भरो उधेड़बुन!
हो किसी की भी समस्या
भोजन सा जाए परोसा
लड़ाई-बहस के बाद भी
बने रहो मुँहझौंसा!
रहीमन कहकर गए
कर का मनका दे डारी
फिरा जो न मनका
तो पीछे पड़े कोतवारी!
Wednesday, March 09, 2022
हाथ की सफ़ाई
Friday, November 12, 2021
सुबह
ये ए टी एम चौबीस घंटे खुला रहता है, पता था क्या?
यहॉं पर बेकरी है, अच्छा! इतनी सुबह खुल भी गया है! क्या बात है! लगता है कोई अपने उद्यम या कम से कम दिनचर्या को लेकर बहुत सीरियस है।
और ये देखिए खुदाई चल रही है, सुबह सुबह। जाने क्या ख़ज़ाना ढूँढ रहे हैं। या शायद रात भर लगे रहें हों, बड़ी मेहनत का काम है ये सब।
रोड के दोनों छोर भी कितने दूर लग रहे हैं। चालिस फीट की सड़क अब पचास की लग रही है। लेकिन यही आप एकाध पहर बाद आईये, मजाल है जो पैर रखने भर की भी जगह दिख जाए।
चौड़ाई जैसी भी हो, ये गड्ढे कहीं नहीं जाने वाले। इस वाले में तो उस दिन भी हिचकोले खाए थे। कैसे भूल सकते हैं। पिछली सीट पर से जो तानाकशी हुई थी, उफ़! अब कैसे समझाएँ कि दाहिने वाले बड़े गड्ढे से बचने के लिए हम बाएँ वाले की आग़ोश में आ गए थे।
किस किस को बताएँगे खुदाई का सबब हम
तू मुझ से खफा है तो ज़माने के लिये आ
रंजिश ही सही...
बाप रे बाप! क्या फ़र्राटे से गाड़ी उड़ा रहे हैं, देखिए। चला ले भाई! कहाँ फिर ये तन्हाई और ये खुली फ़जा़। कम्बख़्त गड्ढे न होते तो तीन चार क़सीदे तो हम खुद पढ़ जाते।
रस्ता वही है बस समय का फेर है। इस पूरे एरिया की पर्सनालिटी ही बदली सी लगती है। सौ पचास की भीड़ जमा दीजिए और कुछ पार्क की हुई गाड़ियाँ, सब कुछ जाना पहचाना लगने लगेगा। किसी नार्मल टाईम और स्पेस में जाने कितनों को कोसा-गरियाया होगा यहॉं, पर अभी देखिए किसी मासूम बच्चे की तरह सो रहा है ये रस्ता।
वैसे ये भेद अमुमन किसी भी दीवार-ओ-दर पर लागू होता है।
बाशिंदों के बग़ैर घर सूना
घर कहॉं -
बेजान बेरंग खड़ी दीवारें, गारा और चूना।
Tuesday, October 12, 2021
दुर्ग
कमाल होते हैं
आधिपत्य, अभिमान की
मिसाल होते हैं।
दुर्ग पहचान होते हैं
शौर्य, साहस
ताकत, घमंड, शान होते हैं!
दुर्ग विक्षिप्त नहीं होते
ढह जाते हैं।
ईंट दर ईंट
अक्षम होते हैं
दीवारों में
दरारें गहराती हैं,
प्राचीरों के जोड़
कमजोर हो जाते हैं
और दुर्ग ढह जाते हैं!
आज एक दुर्ग को
ढहते देख रहा हूँ!
Thursday, October 07, 2021
छोटे ही बने रहे
न हल, न सबक
न शब्द में वज़न
बहाने दो दर्जन!
आगे न आना
बस बातें बनाना
खुद को रिझाना,
समझाना।
आड़ फिर ढूँढते
परतों को ओढ़ते
कश्मकश में डूबते,
विकल्प में ही घूमते।
न पीछे, न आगे
तटस्थ बस जमे रहे
बेख़ुदी में सने रहे,
आज भी छोटे ही बने रहे!
Sunday, October 03, 2021
मुस्कुरा दिए घनश्याम
था दम्भ और स्वार्थ का
समर घनघोर।
द्वारिका प्रासाद में
लगी थी होड़ -
दम्भ सिरहाने, चरण पे स्वार्थ
शैय्या पर सोए रणछोड़।
माँगने पहुँचे थे अनुदान
संकट थी ये बृहत विकराल,
दिया विकल्प सरल सा,
खूब रहस्यमयी थी ये गहरी चाल;
एक तरफ नारायणी सेना
दूसरी ओर निहत्थे गोपाल।
स्वार्थ रहा अचल अडिग,
मॉंग लिया निरस्त्र का साथ,
हुआ दम्भ मदमस्त,
बोला अनुज की नहीं टलेगी बात
स्वार्थ की बुद्धि पे बलिहारी
अंक लगा उसे, गदगद हुए जगन्नाथ ।
न किया विश्वरुप का बखान
न दिया धर्म कर्म का कोई ज्ञान
न बाँधा कोई शब्द पाश
बुनते एक और अनोखी रास,
किया उद्घोष -
थामेंगे वो नंदी घोष की कमान
सत्यापित करते अपना समाधान
बस मुस्कुरा दिए घनश्याम।
सब कुछ
हाड़ मांस का ये शरीर प्राण जैसा कुछ तो है कहते हैं जिसको आत्मा जान गए तो सब कुछ है। नासमझी की है रैली पुरज़ोर है आडम्बर, बह गए तो व्यर्थ ...
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Sholay is not a movie, its a way of life...at least my life ;) Watching Sholay on the big screen (that too in 3D) was a complete e...
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“Even we had a training and test before we joined and this test thing that they have started has made it a very serious affair” , Aman said...
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यूँ ही कब कहाँ ये जीत पाती हर मोड़ पर सकुचाती हर चोट पर मुरझाती एक नज़र पडे तो इतराती अनजान कभी इसे है भाता एक रंग ही कभी रम जाता कभी ...
