पहल में झिझक
न हल, न सबक
न शब्द में वज़न
बहाने दो दर्जन!
आगे न आना
बस बातें बनाना
खुद को रिझाना,
समझाना।
आड़ फिर ढूँढते
परतों को ओढ़ते
कश्मकश में डूबते,
विकल्प में ही घूमते।
न पीछे, न आगे
तटस्थ बस जमे रहे
बेख़ुदी में सने रहे,
आज भी छोटे ही बने रहे!
कैसे दूँ तुम्हें मैं अपने अनुभव की गठरी ? भरे हैं जिसमें मैंने- मेरा गुरूर, मेरी जीत मेरा गर्व, मेरी प्रेरणा मेरी ईर्ष्या, मेरा भ्रम, मेरी ...
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