Thursday, November 23, 2017

ब्रह्मराक्षस

कुल में जन्मा, कुलीन न हो सका!
मर्यादा, अहंकार सब है बदा
रहा निर्जीव, सजग हो न सका!
संग थे पोथी, पंडित और अभिमान
कितने वेद, कितने छंद, कितने पुराण
रहा मूक, कंठ उनको दे न सका!
कर्म को ही धर्म बना -
जन्म क्या और जीवन क्या?

वो जो रहे अपदस्थ, वंचित
जन्म का श्राप ढोते हुए,
लालायित, आशापूर्ण आस लगाए हुए!
मुँह फेर, जाने बुरा किया या भला?
बोझ उनका था ज़्यादा 
या उम्मीद थी हमारी भीमकाय।
हाथ न दो तो किस्मत को कोसते,
जो बढ़ाओ हाथ तो होती न ज्ञान की हूक,
सुगम पथ पर कौन बना महान!

संजोया थोड़ा पर बांचा नहीं ज्ञान,
दूसरों के दु:ख से रहा सर्वदा अनजान।
हर झोंके में खोया खुद को
अनवरत रख न सका स्वाभिमान।
कुलीन होने के सारे गुण -
स्वार्थ, अहं को सौंप कर
सशक्त कर, बनाया उनको ही सर्वशक्तिमान!

मौत होगा एक अभिशाप 
या होगा निरवान!
जागकर शैया से बनूंगा क्या?
भटकता प्रेत या ब्रह्मराक्षस!

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