मुल्क़ के हश्र की आओ सुने दास्ताँ
अनुशाषन लटका ताक पर,
कोने में दुबक कर,
सिसकी भर रहा हिंदुस्तान।
बिस्मिल, आज़ाद, भगत के
किस्सों पर खिलखिलाते नौजवान,
निठल्लों की खड़ी फ़ौज
कैसे हो भारत महान।
ज़िन्दगी चाल हुई महंगी बिसात पर
मौत का तिजारत हो गया सस्ता।
अब तो हर अड्डे-नुक्कड़ पर,
क्या चाय की टोलियॉं और क्या फेसबुक
सभी जगह है एक इन्किलाबी दस्ता।
पत्थर बरसे प्रहरी पर,
लठ बरसे सैनिक पर,
सर कटे जिस्मों का
लगता जाता ढेर
कश्मीरियत की ढाल के पीछे
चल रहा निन्यानवे का फेर।
गरीबों के लिए लड़ने वाले
खुद अमीर हो जाते हैं।
आज़ादी के नारे लगाकर
अपने आराम गृह को रुखसत हो जाते हैं।
मोमबत्तियों की भीड़
धू-धू कर जलती है।
ख्याल पकाओ उसमे
देखो शायद अब भी आंच बाकी है।
क्या, क्यों, कब बदलेगा
हमसे मत पूछो ये सवाल।
लठ, ज़ंजीर, हथियार उठाओ
चलो मिलकर करें बवाल।
Friday, July 21, 2017
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