दिन
बीत रहे हैं
गुज़र रहे हैं
फिसल रहे हैं
खिसक रहे हैं
लुढ़क रहे हैं
नहीं रुक रहे हैं।
हम
गिन रहे हैं
जोड़ रहे हैं
जोह रहे हैं
खो रहे हैं
आस
अब भी लगा रहे हैं।
बीत रहे हैं
गुज़र रहे हैं
फिसल रहे हैं
खिसक रहे हैं
लुढ़क रहे हैं
नहीं रुक रहे हैं।
हम
गिन रहे हैं
जोड़ रहे हैं
जोह रहे हैं
खो रहे हैं
आस
अब भी लगा रहे हैं।
इतना आसान नहीं होता हवाओं से हल्के मन को खुली फ़िज़ाओं में उड़ने देना! कई गिरह खोलने पड़ते हैं कई कड़ियाँ तोड़नी पड़ती हैं और देखिए विडम्बना...