Wednesday, October 02, 2024

दिन

दिन 

बीत रहे हैं

गुज़र रहे हैं

फिसल रहे हैं

खिसक रहे हैं

लुढ़क रहे हैं

नहीं रुक रहे हैं।


हम

गिन रहे हैं

जोड़ रहे हैं

जोह रहे हैं

खो रहे हैं

आस

अब भी लगा रहे हैं।

इतना आसान नहीं होता

इतना आसान नहीं होता हवाओं से हल्के मन को खुली फ़िज़ाओं में उड़ने देना! कई गिरह खोलने पड़ते हैं कई कड़ियाँ तोड़नी पड़ती हैं और देखिए विडम्बना...