अलसाई ऑंखों को मलते
बासी नींद में लड़खड़ाते
उबासियों की नि:शब्द तान लगाते
अब जो होड़ में लग जाते हैं
पुरानी यादें जाती जैसे बिखर!
क्या बदला हमें ही है खबर
पहले जाते थे स्कूल,
अब दफ्तर!
इतना आसान नहीं होता हवाओं से हल्के मन को खुली फ़िज़ाओं में उड़ने देना! कई गिरह खोलने पड़ते हैं कई कड़ियाँ तोड़नी पड़ती हैं और देखिए विडम्बना...
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