आज फ़िर ज़िन्दगी ने दी पटखनी
आज फिर कंधो पर बोझ का एहसास हुआ;
आज फिर प्रयास में हाथ गंदे हुए
पर किसी उपलब्धि की कमी खली;
आज फिर सपनों की लड़ी बिखरी
आज फिर उन्हें संजोने का मन बनाया
आज फिर आसमान अपरिमित लगा
आज फिर डर ने साहस को खदेड़ दिया;
आज फिर एक शोर विचारों पर आच्छादित हुआ
आज फिर सुर ने धुन का साथ छोड़ा;
आज फिर उम्मीद का दीपक बुझता हुआ सा लगा
आज फिर तमस प्रकाश पर हावी हुआ।
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मैं ख़ुद ही नहीं वो जो मैं पहले था तो लाज़मी है कि तुम मुझसे बिफरे रहो! कभी था मस्त मौला न पीछे की सोच, न आगे का डर! थोड़ी अकड़, थोड़ा निष्फ...
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the poem is jus too good. the words , the feelings .. it's amazing.. keep it up
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