आज फ़िर ज़िन्दगी ने दी पटखनी
आज फिर कंधो पर बोझ का एहसास हुआ;
आज फिर प्रयास में हाथ गंदे हुए
पर किसी उपलब्धि की कमी खली;
आज फिर सपनों की लड़ी बिखरी
आज फिर उन्हें संजोने का मन बनाया
आज फिर आसमान अपरिमित लगा
आज फिर डर ने साहस को खदेड़ दिया;
आज फिर एक शोर विचारों पर आच्छादित हुआ
आज फिर सुर ने धुन का साथ छोड़ा;
आज फिर उम्मीद का दीपक बुझता हुआ सा लगा
आज फिर तमस प्रकाश पर हावी हुआ।
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अनुभव की गठरी
कैसे दूँ तुम्हें मैं अपने अनुभव की गठरी ? भरे हैं जिसमें मैंने- मेरा गुरूर, मेरी जीत मेरा गर्व, मेरी प्रेरणा मेरी ईर्ष्या, मेरा भ्रम, मेरी ...
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कहीं छंदों का कहीं संगों का कहीं फूल बहार के खेलों का चट्टानों, झील समंदर का सुन्दर रंगीन उपवनों का ख़ुशबू बिखेरती सुगंध का, कभी रसीले पकवान...
the poem is jus too good. the words , the feelings .. it's amazing.. keep it up
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