ख़लिश
क्यों डरे है ज़िन्दगी में क्या होगा, कुछ न होगा तो तजुर्बा तो होगा।
Monday, March 10, 2025
Wednesday, October 02, 2024
दिन
बीत रहे हैं
गुज़र रहे हैं
फिसल रहे हैं
खिसक रहे हैं
लुढ़क रहे हैं
नहीं रुक रहे हैं।
हम
गिन रहे हैं
जोड़ रहे हैं
जोह रहे हैं
खो रहे हैं
आस
अब भी लगा रहे हैं।
Friday, August 23, 2024
बच गए
क्या हार में क्या जीत में
किंचित नहीं भयभीत मैं
संधर्ष पथ पर जो मिले यह भी सही वह भी सही।
Sunday, June 16, 2024
थी जगह वही
पर वीरानी लगती है।
यादों के कोरों से निकालने पर
पहचानी सी लगती है।
वही रास्ता, वही चौक
पर लोग बदले से लगते हैं
इन मोड़ों पर, दुकानों पर लोग
अब अपने नहीं लगते हैं।
बदलाव ही जीवन है
पर हम कैसे बदल जाएँ
जहां जुड़-तुड़कर बनें हम,
उस माहौल को कैसे भूल जाएँ!
जिन से थी हमारी पहचान
उन्हें खोते जा रहें हैं,
दिशाहीन धड़, कमज़ोर जड़
न इधर के न उधर के
Monday, March 18, 2024
बेकर्स डज़न
बाकी दो भाई कभी-कभी ही अवतरित होते थे। लेकिन उनमें ख़ासा फ़रक यही था कि वो काली बुलेट पर काले कपड़ों में ही आते थे। दूध दही खाया हुआ शरीर और बस अपने काम से काम। जब उनको दूध को एक कनस्तर से दूसरे में डालते देखते थे तो हमारे अबोध से मन में बड़ा ही माचो सा इमेज बनता था - कि बड़े होकर यही काम करना है! और साथ में फ़िल्मों और कहानियों में सुनी सुनाई बात वाली शंका भी उभरती थी कि ऐसे खुलेआम दूध में पानी कैसे मिला रहें हैं ये लोग!
और हमें लगता है, लगता क्या है, शर्तिया यही बात है कि हमारे अचेतन मन ने उसी इमेज से प्रोत्साहित होकर हमें काली बुलेट लेने के लिए प्रेरित किया था।
तीनों ग्वाल बंधुओं में, भैरव के नाम के अलावा, एक और समानता थी - वही बेकर्स डज़न!
उनके पास माप के लिए क़रीब एक क्वार्टर लिटर का ग्लासनुमा बर्तन था जिसे स्थानीय भाषा में पौआ कहते हैं। अब ये उनका अपराध बोध था या उदारता कि वो छह पौआ नापने के बाद, हमारी डेगची में थोड़ा ज़्यादा दूध डाल देते थे। और अगर हमने माँग की तो करीब आधा पौआ अधिक दूध दे देते थे।
ये सब सोचते हुए कुछ और बातें याद आईं कि कैसे पहले लोग सब्ज़ी ख़रीदने के बाद एक गुच्छा मिर्च, धनिया पत्ता, कुछ नहीं तो निम्बू ही उठा लेते थे। उसे भी क्या बेकर्स डज़न कहना ठीक होगा। नहीं जिस तरह से बेझिझक ये लोग अतिरिक्त आइटम उठाते थे उसे शायद बायर्स धाक कहना सही होगा।
Thursday, March 07, 2024
Prejudice
वही सशक्त है
जो सशक्त है
वही खूबसूरत!
चारदीवारी के इस तरफ
अल्फा है, बेटा है, गामा तो कई हैं
उस तरफ दबती हसरतों से उपर उठती
चाहें हैं, हौसला है,
और हॉं
बेटा और गामा की मॉं है!
तो चारदीवारी बनाने वालों
बस ये जानिए
कि जो खूबसूरत है
वही सशक्त है
जो सशक्त है
वही खूबसूरत!
Saturday, February 17, 2024
कविता
युगों की व्याख्यान
दशकों की टोह लेती है।
कहीं हर्ष
कहीं संघर्ष,
बिस्मिल कहीं,
पाश कहीं,
व्यग्र भीड़ को छंद देती है,
कविताएँ अमर होती हैं।
कभी आह्लाद;
कहीं बल
कहीं आस
शब्दों को धुन
धुनों को शब्द देती है;
कितने सपनों को पंख
कितनों को उड़ान देती है,
कविताएँ अमर होती हैं।
-
यह दिन बाकी दिनों के जैसा नहीं था। आज कार या बाइक की जगह हमने ऑफिस जाने के लिए कैब लेने का फ़ैसला लिया था। तबियत कुछ ख़राब थी और गला घोटने व...
-
Sholay is not a movie, its a way of life...at least my life ;) Watching Sholay on the big screen (that too in 3D) was a complete e...
-
“Even we had a training and test before we joined and this test thing that they have started has made it a very serious affair” , Aman said...